Sunday, 27 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............

भगवान  राम विभिषण से पूछते हैं कि विभिषण बताओ ! रावण कैसे मरेगा ? बड़ी विचित्र शैली है गोस्वामीजी की। लोग तो इस बात का बड़ा ध्यान रखते हैं कि आगे-पीछे की बात एक दूसरे से कटनी नहीं चाहिए। इस दृष्टि से तो गोस्वामीजी को विभिषण के द्वारा वही उत्तर दिलवाना चाहिए था, जो त्रिजटा ने सीताजी को दिया, पर बड़ी अद्भुत बात है, जो उत्तर त्रिजटा ने सीताजी को दिया, वही विभिषण ने भगवान राम को नहीं दिया। उन्होंने यह नहीं कहा कि आप रावण के ह्रदय पर प्रहार करेंगे, तब रावण की मृत्यु होगी। बल्कि उन्होंने एक नयी बात कह दी। इसका अभिप्राय क्या है ? मानो गोस्वामीजी बताना चाहते हैं कि त्रिजटा का सत्य भी सत्य है और विभिषण का सत्य भी सत्य है। इन सबमें कोई न कोई सामंजस्य है। इनमें से किस केन्द्र के माध्यम से हम रावण की मृत्यु को मुख्यता देते हैं, इसका निर्णय हम स्वयं अपनी साधना-पध्दति से करें। अन्त में सबका सामंजस्य तो होना ही है।
           भगवान राम विभिषण से पूछते हैं कि बताओ ! रावण कैसे मरेगा ? इसके उत्तर में विभिषण ने न तो सिर को केन्द्र बताया और न ह्रदय को। उन्होंने तो नाभि को केन्द्र बताया। वे बोले कि महाराज ! रावण की नाभि में अमृतकुण्ड है और जब तक यह अमृतकुण्ड नहीं सूखेगा, तब तक रावण न तो सिर काटने से मरेगा, न भुजा काटने से, बल्कि हर बार उसके सिर और भुजाएँ उत्पन्न होती जायेंगी।
            .........आगे कल ......

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