अपनी समस्या को जीव समझता है और जब ईश्वर और जीव का मिलन होता है तभी समस्या का समाधान होता है। यह सामंजस्य रामायण में बताया गया है -
राम कृपाँ नासहिं सब रोगा ।
जौं एहि भाँति बनै संयोगा ।।
इसका अभिप्राय यह है कि व्यक्ति का प्रयत्न - उसकी तीव्र आकांक्षा और भगवान की कृपा, दोनों का जब सामंजस्य होता है, तभी समस्या का समाधान होता है। इन दोनों में अगर एक की भी कमी रह जाय, व्यक्ति के जीवन में अगर केवल भगवान की कृपा कहने की वृत्ति आ जाय, तो उसमें तमोगुण, आलस्य और निष्क्रियता की वृत्ति भी आ जायेगी और अगर उसमें केवल पुरुषार्थ की वृत्ति आ जाय तो उसके अन्तःकरण में अभिमान की वृत्ति भी आ जायेगी। निष्क्रियता और अभिमान इन दोनों से बचने का उपाय यह है कि पुरुषार्थ व्यक्ति के तमोगुण को दूर करे और भगवान की कृपा उसके अभिमान का नाश करे और इस तरह जीवन में एक सामंजस्य स्थापित हो।
राम कृपाँ नासहिं सब रोगा ।
जौं एहि भाँति बनै संयोगा ।।
इसका अभिप्राय यह है कि व्यक्ति का प्रयत्न - उसकी तीव्र आकांक्षा और भगवान की कृपा, दोनों का जब सामंजस्य होता है, तभी समस्या का समाधान होता है। इन दोनों में अगर एक की भी कमी रह जाय, व्यक्ति के जीवन में अगर केवल भगवान की कृपा कहने की वृत्ति आ जाय, तो उसमें तमोगुण, आलस्य और निष्क्रियता की वृत्ति भी आ जायेगी और अगर उसमें केवल पुरुषार्थ की वृत्ति आ जाय तो उसके अन्तःकरण में अभिमान की वृत्ति भी आ जायेगी। निष्क्रियता और अभिमान इन दोनों से बचने का उपाय यह है कि पुरुषार्थ व्यक्ति के तमोगुण को दूर करे और भगवान की कृपा उसके अभिमान का नाश करे और इस तरह जीवन में एक सामंजस्य स्थापित हो।
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