Monday, 7 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........

यदि हमारे जीवन में काम, क्रोध और लोभ के ये तीनों विकार संतुलित हैं, तो मानस रोग दूर होते हैं। अतः हम इन तीनों को नियमित और संतुलित करने की चेष्टा करें, उन्हें ऐसी दिशा में मोड़ दें जिससे वे हमारे तथा समाज के लिए कल्याणकारी हो सकें। जो शरीर का रोगी है, वह अकेले ही उस रोग के फल का भोग करता है, पर मन का रोगी दूसरे व्यक्ति को भी रोगी बना देता है। एक व्यक्ति का काम दूसरे में क्रोध की उत्पत्ति करता है। यदि अकेला व्यक्ति कामी बनेगा तो उसकी प्रतिक्रिया में दूसरा व्यक्ति, जिसे हानि होगी, क्रोधी बनेगा। एक लोभी समाज को दरिद्र बना देता है। एक क्रोधी समाज में भय की सृष्टि कर देता है। इस प्रकार एक अस्वस्थ व्यक्ति समाज को भी अस्वस्थ बना देता है यही मानस - रोगों की समस्या है। संतुलित और स्वस्थ समाज के लिए व्यक्ति का मानस-रोगों से मुक्त होना आवश्यक है।

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