ये जो व्यक्ति की समस्याएँ हैं, इनके संदर्भ में भी अलग-अलग केन्द्रों से विचार किया गया है और व्यक्ति तथा समाज को स्वस्थ बनाने के लिए ज्ञानियों ने एक भिन्न केन्द्र से समाज की स्वथ्यता का उपाय बताया ; फिर भक्तों ने दूसरी पध्दति से ; कर्मयोगियों ने तीसरी पध्दति से और पातंजल योगसूत्र ने चौथी पध्दति से इन पर चर्चा की। इस प्रकार ये जो अन्तःकरण की वृत्तियाँ हैं, उनको केन्द्र बनाकर अगणित प्रकार से व्यक्ति की स्वथ्यता के अलग-अलग उपाय बताये गये।
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