सांकेतिक रूप से वर्णन आता है कि रावण को मारना बड़ा कठिन है। वह मूर्तिमान मोह है और मोह ही समस्त रोगों के मूल में है। इसलिए भगवान श्रीराम रावण पर जब प्रहार करते हैं तो आप पढ़ते हैं कि उन्हें रावण के तीन केन्द्रों पर प्रहार करना पड़ा - रावण का भुजा एवं सिर काट दिया, उसके हृदय पर प्रहार किया गया और उसकी नाभि पर बाण मारा गया। रावण की मृत्यु के ये तीन केन्द्र हैं। रावण के सिर और भुजाएँ तो कई बार भगवान श्रीराम द्वारा काट डाली गयी थीं, पर हर बार उसके नये सिर और नयी भुजाएँ निकल आती थी। जब भगवान राम ने विभिषण से पूछा कि रावण के तो नये-नये सिर और भुजाएँ निकल आती हैं, इसका क्या उपाय है ? तो विभिषण ने कहा - प्रभु! इसकी भुजा पर ही प्रहार कीजिए और इसके सिर पर भी, पर साथ-साथ आप इन सबके मूलकेन्द्र मन और चित्त पर भी प्रहार कीजिए। भुजा पर प्रहार करने का अभिप्राय यह है कि शरीर के द्वारा जो दुष्कर्म होता है उस पर प्रहार, सिर पर प्रहार करने का अर्थ होता है बुद्धि पर प्रहार। रावण को अपनी बुध्दिमता का जो गर्व था और अपने विषय में जो यह विश्वास था कि मैं अमर हूँ, तो ऐसी बुद्धि और अहंकार को नष्ट करने के लिए उसका सिर काटना होगा। फिर उसके मन में परिवर्तन लाने के लिए उसके हृदय में प्रहार करना होगा, पर इन तीनों के साथ-साथ जब तक इन सबके मूल में - चित्त में जो संस्कार संग्रहीत हैं, उन पर प्रहार नहीं होगा, तब तक चित्त के संस्कार नहीं सुखेंगे, तब तक काम नहीं बनेगा। भगवान राम चारों स्थानों पर प्रहार करते हैं और इस प्रकार रावण की मृत्यु होती है।
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