Friday, 25 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............

.....कल से आगे....
जब हम भगवान से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि - त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देवदेव।। इस पर भगवान यदि कहें कि अच्छी बात है, चलो ! हम तुम्हारे माता, पिता, बन्धु, मित्र, धन और विद्या सब ले लेते हैं और हमही तुम्हारे सब बन जाते हैं, तो कितने लोग इसके लिए राजी होंगे ? तात्पर्य यह है कि कहीं न कहीं हमारी प्रार्थना में अंतर्द्वन्द है। प्रार्थना तो हम लोग भगवान से नित्य करते हैं, पर क्या हम सच्चे अर्थों में इस प्रार्थना को साकार देखना चाहते हैं ?

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