......कल से आगे.......
सीताजी मूर्तिमती भक्ति हैं। त्रिजटा और सीताजी का संवाद भक्ति के संदर्भ में है। भक्तिशास्त्र की मान्यता यह है कि ह्रदय-परिवर्तन के द्वारा ही मोह का विनाश होगा। इसलिए वहाँ पर ह्रदय को केन्द्र बनाकर बात कही गयी और यहाँ संवाद अखण्ड-ज्ञानघन भगवान और जीवरुपी विभिषण के बीच है। नाभिकुण्ड का अभिप्राय क्या है? यही संस्कारों का अमृतकुण्ड है। साधक जिन बुराइयों को मिटाना चाहता है, वे फिर से नये सिरे से रावण की सृष्टि करने में समर्थ होती है, इसलिए विभिषण भगवान से कहते हैं कि आप उसकी नाभि पर बाण का प्रहार कर उसके अमृतकुण्ड को सुखा दीजिए। यह योग का मार्ग है। योगाग्नि के द्वारा चित्त की वृत्तियाँ निरुद्ध हो जाती है, वह निर्विकल्प हो जाता है। चित्त का निर्विकल्प हो जाना ही रावण की मृत्यु है। इस तरह से इन अलग-अलग प्रसंगों में अलग-अलग रूपों में एक ही समस्या के भिन्न-भिन्न समाधान प्रस्तुत किये गये हैं और ये सभी समाधान बड़े उपयोगी हैं, पर मुख्य बात यही है कि इनमें से कौन सी चिकित्सा - पध्दति हमारे लिए ठीक है, हम कहाँ से प्रारंभ करें, इसका चुनाव हमें करना है।
सीताजी मूर्तिमती भक्ति हैं। त्रिजटा और सीताजी का संवाद भक्ति के संदर्भ में है। भक्तिशास्त्र की मान्यता यह है कि ह्रदय-परिवर्तन के द्वारा ही मोह का विनाश होगा। इसलिए वहाँ पर ह्रदय को केन्द्र बनाकर बात कही गयी और यहाँ संवाद अखण्ड-ज्ञानघन भगवान और जीवरुपी विभिषण के बीच है। नाभिकुण्ड का अभिप्राय क्या है? यही संस्कारों का अमृतकुण्ड है। साधक जिन बुराइयों को मिटाना चाहता है, वे फिर से नये सिरे से रावण की सृष्टि करने में समर्थ होती है, इसलिए विभिषण भगवान से कहते हैं कि आप उसकी नाभि पर बाण का प्रहार कर उसके अमृतकुण्ड को सुखा दीजिए। यह योग का मार्ग है। योगाग्नि के द्वारा चित्त की वृत्तियाँ निरुद्ध हो जाती है, वह निर्विकल्प हो जाता है। चित्त का निर्विकल्प हो जाना ही रावण की मृत्यु है। इस तरह से इन अलग-अलग प्रसंगों में अलग-अलग रूपों में एक ही समस्या के भिन्न-भिन्न समाधान प्रस्तुत किये गये हैं और ये सभी समाधान बड़े उपयोगी हैं, पर मुख्य बात यही है कि इनमें से कौन सी चिकित्सा - पध्दति हमारे लिए ठीक है, हम कहाँ से प्रारंभ करें, इसका चुनाव हमें करना है।
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