Thursday, 24 September 2015

युग तुलसी श्रीरामकिंकर उवाच्...........

......कल से आगे.....
भगवान राम रावण को मारते-मारते थक गये, पर रावण मरता ही नहीं। भगवान भी अभिनय में दिखाते हैं कि यह युद्ध कितना कठिन है। यह बुराइयों के प्रति संघर्ष कोई एक क्षण में समाप्त होने वाली प्रक्रिया नहीं है। यह सतत निरन्तर चलते रहने वाली प्रक्रिया है। इसे हम यह न समझ लें कि एक दिन कोई हवन-पूजन-अनुष्ठान कर दे और सारी समस्या का समाधान हो जाय। वह तो एक के बाद दूसरी, दूसरी के बाद तीसरी, जीवनभर की समस्या है। भगवान राम स्वयं इस नरलीला में थककर विभिषण की ओर देखते हैं। मस्तक पर पसीने की बूँदें आ जाती हैं। ईश्वर तो बड़ा अनोखा है, उसे जीव से पूछना पड़ रहा है कि रावण कैसे मरेगा ? भगवान तो जीव की परीक्षा लेना चाहते थे कि तुम प्रार्थना तो करते थे कि रावण को मार दीजिए, पर क्या तुम वास्तव में चाहते हो कि यह मरे ? यही हमारे जीवन का सत्य है। प्रार्थना तो हम लोग भगवान से नित्य करते हैं कि भगवान ! बुराई को मिटाइए। पर क्या हम सच्चे अर्थों में इस प्रार्थना को साकार देखना चाहते हैं ?
                .......आगे कल.......

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