Sunday, 6 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..........

प्रश्न यह है कि क्रोध की आवश्यकता है या नहीं ? उसका उत्तर एक प्रतिप्रश्न करके दिया जा सकता है कि घर में अग्नि की आवश्यकता है या नहीं ? व्यक्ति जरा सा भी असावधान हो जाय, तो घर जल जाय, वह स्वयं जलकर मर जाय, पर अग्नि यदि नियंत्रित हो, तो भोजन पकाया जा सकता है। तात्पर्य यह है कि अग्नि की आवश्यकता तो है, पर उसे नियंत्रित होना चाहिए। विवाह के प्रसंग में हम भगवान राम के जीवन में क्रोध का यही नियंत्रित स्वरूप देखते हैं। उन्होंने परशुराम से धीरे से एक वाक्य कह दिया- महर्षि , आपने बहुत दिन तक क्रोध किया, आप ब्राह्मण हैं, आपको क्रोध शोभा नहीं देता, ब्राह्मण के ह्रदय में बहुत अधिक दया होनी चाहिए। आपने कृपा वाले पक्ष को छोड़ दिया है।  भगवान राम की भाषा बड़ी संतुलित है। भगवान राम का तात्पर्य यह है कि जहाँ क्रोध के साथ क्षमाशीलता का नियंत्रण है, ऐसा क्रोध ही रोग को दूर करने में समर्थ होता है। शीलवान का क्रोध अन्याय के, दुर्गुणों के विरुद्ध होगा और सृष्टि के सृजन में उसका उपयोग होगा।

No comments:

Post a Comment