कई लोगों के मन में पध्दति के प्रति इतना अधिक आग्रह हो जाता है कि वह भी एक समस्या बन जाती है। आग्रह ही नहीं होगा तो साधना आगे नहीं बढ़ेगी, पर आग्रह का अतिरेक भी कभी-कभी व्यक्ति को सत्य से वंचित कर देता है। जैसे किसी रोगी को किसी एक चिकित्सा-पद्धति के प्रति ही इतना अधिक आग्रह हो जाय कि उस पद्धति से लाभ न होने पर भी वह उसे न छोड़े, तो यह तो रोग से भी बड़ी समस्या है। मुख्य लक्ष्य क्या है ? स्वथ्यता। तो पद्धति के चुनाव के लिए सबसे बड़ी कसौटी क्या है ? यही कि जिस पद्धति से हमें स्वथ्यता का लाभ हो वही पद्धति हमारे लिए ठीक है। शास्त्र या किसी व्यक्ति के कहने से कि यह पद्धति श्रेष्ठ है, कोई आवश्यक थोड़े है कि वह सबके लिए समान रूप से लाभदायक हो। गोस्वामीजी से पूछा गया कि ये जितने उपाय कहे गये हैं, इनमें सही कौन सा है ? उन्होंने कहा कि सब सत्य है। झूठ तो कुछ है ही नहीं। मैं मानता हूँ कि समस्त ऋषि-मुनियों का, समस्त आचार्यो का अनुभव सत्य है। विभिन्न चिकित्सा-पद्धतियों के द्वारा अगणित लोग स्वस्थ हो रहे हैं, उसी तरह भिन्न-भिन्न साधना-पद्धतियों से लोग स्वस्थ हो रहे हैं तो हम कैसे कहें कि यह पद्धति वैज्ञानिक है और यह अवैज्ञानिक।
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