रामचरितमानस में एक और दृष्टांत है, जैसे किसी वृक्ष के संबंध में विवाद हो कि यह कौन सा वृक्ष है ? तो निर्णय यह हुआ कि उस वृक्ष के फल से अनुमान करना चाहिए - फलेन परिचीयते। फल को देखकर वृक्ष का पता चल जायगा। तब एक-एक व्यक्ति क्रम से वृक्ष के पास गये और फल लेकर लौटे। लेकिन इससे विवाद का निपटारा नहीं हुआ, क्यों ? जितने व्यक्ति फल लेकर लौटे, उन सबके हाथ में अलग-अलग फल थे और जिसके हाथ में जो फल था, वह उसी का वृक्ष कह रहा था और सचमुच इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता था कि वह स्वयं फल उसी वृक्ष से वह लेकर आ रहा है और परिणाम यह हुआ कि विभिन्न प्रकार के फल लेकर लौटने वाला हर व्यक्ति यह दावा करने लगा कि जो फल उसके हाथ में है, उसी सा वह वृक्ष है। कोई कह रहा था आम का वृक्ष है, कोई कह रहा था अमरूद का है, कोई इमली का, कोई केले का। अंत में किसी संत से पूछा गया। संत ने कहा - भाई ! वह तो कल्पवृक्ष है। उसके नीचे जाकर जिसने जो कल्पना की, उसे वही फल मिला। ईश्वर भी ऐसा ही है। वह कल्पतरु है। अपनी कल्पना ही उसमें दिखाई देती है। वैसे तो कल्पना असत्य को कहते हैं, जिसका कोई अस्तित्व नहीं होता। लेकिन कल्पना जब कल्पतरु से जुड़ जाती है तो सत्य हो जाती है। कल्पतरु की विलक्षणता यही है कि उसमें कल्पना को सत्य करने का सामर्थ्य है।
No comments:
Post a Comment