Tuesday, 22 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............

रामायण में समन्वय और सामंजस्य है। गोस्वामीजी ने सामंजस्य को स्वीकार किया। रावण सारी समस्याओं का घनीभूत रूप है। उसमें मनोजन्य, बुद्धिजन्य, चित्त की संस्कारजन्य और अहंकारजन्य चारों प्रकार की समस्याएँ विद्यमान हैं और चारों का केन्द्र भी। रावण का सिर कट जाता है, पर वह मरता नहीं। सिर एक केन्द्र है बुद्धि का। सिर में ही मस्तिष्क है और मस्तिष्क से ही मनुष्य विचार करता है। सिर कटना महत्वपूर्ण है। सिर कटने से व्यक्ति मर जाता है, पर रावण नहीं मरता। क्यों नहीं मरता ? और सिर कटने पर नहीं मरा तो कैसे मरेगा ? इसका अलग-अलग उत्तर रामचरितमानस में दिया गया है। रावण के ह्रदय पर प्रहार होगा, तभी वह मरेगा। जब रावण की नाभि में प्रहार होगा तब वह मरेगा। अलग-अलग प्रसंगों में अलग-अलग उत्तर है। त्रिजटा से सीताजी पूछती हैं कि रावण सिर कटने पर भी क्यों नहीं मरता है ? त्रिजटा कहती है कि रावण केवल सिर काटने से नहीं मरेगा। सिर के साथ उसकी भुजाएँ भी कटेंगी और ह्रदय पर भी प्रहार होगा, तब वह मरेगा।  यही है सामंजस्य।
            .........आगे कल......

No comments:

Post a Comment