कर्मयोग में धर्म का केन्द्र अहंकार है। धर्म में जो हम वर्ण और आश्रमधर्म देखते हैं उसका केन्द्र है व्यक्ति का अहंकार। कर्म सिध्दांत में कहा गया है कि व्यक्ति में "मैं" स्वाभाविक है। यह "मैं" ही सारी समस्या का मूल है। इसे छोड़ना होगा, पर कहना कितना आसान है, "मैं" को छोड़ना उतना आसान नहीं। तब कहा गया कि अगर न छूटे तो उसका सदुपयोग करना चाहिए। उस "मैं" को धर्म की दिशा में मोड़ दिया जाय। एक धार्मिक के "मैं" को एक वर्णाश्रम धर्म के "मैं" में परिवर्तित कर दिया जाय ताकि उस "मैं" का, 'मैं' ब्रह्मचारी हूँ, ऐसा मानकर ब्रह्मचर्य में उसकी निष्ठा हो। 'मैं संन्यासी हूँ', ऐसा मानकर संन्यास में, त्याग में उसकी निष्ठा हो। इसलिए धर्म का केन्द्र 'मैं' है, जहाँ उसके सदुपयोग के द्वारा समाज को सुव्यवस्थित बनाने की चेष्टा की गयी।
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