बिल्वमंगल जब भगवान राम के मंदिर में गये और उन्होंने भगवान से कहा कि आप बड़े सुन्दर लग रहे हैं, पर जरा धनुष-बाण हटाकर हाथ में वंशी ले लीजिए तो तुरन्त उन्होंने धनुष-बाण त्यागकर हाथ में वंशी ले ली और इसी तरह गोस्वामीजी जब वृंदावन गये और मंदिर में जाकर भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन किया तो उनके सौन्दर्य की प्रशंसा करते हुए बोले कि आप बड़े सुंदर तो लग रहे हैं, पर हाथ में थोड़ा धनुष-बाण ले लीजिए और भगवान वंशी छोड़कर हाथ में धनुष-बाण ले लेते हैं। इस तरह वे तो इतने बढ़िया अभिनेता हैं कि बिल्वमंगल की माँग पर धनुष-बाण छोड़कर वंशी धारण कर लेते हैं और गोस्वामी तुलसीदास की माँग पर वंशी छोड़कर धनुष-बाण धारण कर लेते हैं। इसका अभिप्राय यह है कि उस ईश्वर को हर व्यक्ति ने अपने अन्तःकरण के मंच पर, अपने जीवन में जिस रूप में देखना चाहा, ईश्वर ने उसकी प्रार्थना स्वीकार करके स्वयं अपने आपको उसी रूप में प्रदर्शित कर दिया। मानो एक अभिनेता में जो विलक्षणता है, वही विलक्षणता ईश्वर में है।
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