Tuesday, 1 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............

कथा आती है कि कोई संत नौका में बैठकर जा रहे थे। उस नौका में जितने अन्य यात्री थे सब बड़े दुष्ट थे। वे उन संत की खूब हँसी उड़ा रहे थे। हँसी-हँसी में उनमें से एक ने कहा कि संत लोग तो बड़े समत्व में रहते हैं और ऐसा कहकर उनके सिर पर जूता रख दिया। संत ने तो बुरा नहीं माना, पर उनका यह अनादर भगवान से सह्य नहीं हुआ और आकाशवाणी हुई- तुम कहो तो मैं इस नाव को उलट दूँ और सारे दुष्टों को डूबो दूँ। इस बात पर संत ने बहुत बढ़िया बात कही - महाराज! जब आपके मन में उलटने की बात आ गयी है तो मैं कैसे रोकूँ? उलट दीजिए! लेकिन उलटना ही है तो इन लोगों की बुद्धि उलट दीजिए। जिससे इनकी ऐसी वृत्ति ही मिट जाय। नाव उलटना ठीक नहीं। इससे आपकी उलटने की इच्छा भी पूरी हो जायेगी और इनकी बुद्धि भी उलट जायेगी।

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