Tuesday, 15 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............

अगर हम संसार के संदर्भ में कल्पना करें तो शायद वह साकार न हो, पर ईश्वर के संदर्भ में जब सन्तों ने कल्पना की तो उसे ईश्वर ने पूरा किया। अलग-अलग संतों को और आचार्यों को जो अलग-अलग फल दिखाई दे रहा है, इसका अभिप्राय यह है कि उन्होंने जैसी भावना और कल्पना की, ईश्वर के द्वारा उसकी पूर्ति ही हुई। मनु के संदर्भ में साधना के इसी सत्य को प्रकट किया गया है। भगवान मनु के सामने प्रकट नहीं हुए। उन्होंने मनु से पूछा कि तुम क्या चाहते हो ? तो मनु ने पहला वाक्य यही कहा कि मैं आपको देखना चाहता हूँ। फिर भी भगवान प्रकट नहीं हुए और उन्होंने मनु से पूछा कि तुम किस रूप में दर्शन चाहते हो ? इसका अभिप्राय क्या है ? यह कि ईश्वर के रूप और गुण की भावना और कल्पना का निर्णय तो हमें करना है। भगवान कहते हैं, निर्णय करने में मैं समर्थ नहीं हूँ, यह तुम्हें करना है।

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