मनुष्य के मन में जो संस्कार दिखाई देते हैं, उनका मूल चित्त में है। यह चित्त पूर्व-पूर्व जन्मों के संस्कारों को संग्रहीत किये रहता है। तब फिर चिकित्सा कैसे होगी? चिकित्सा का क्रम कैसे चलेगा ? चित्त में संस्कार बनते हैं और चित्त के संस्कार मन पर दोष के रूप में उभरते हैं और मन में जो दोष आते हैं, वे ही क्रिया में प्रकट होते हैं, तो पिछले दिनों जो बात कही गयी थी कि यदि हम बुद्धि के द्वारा बुराई को बुराई समझ लें तथा अपने अन्तःकरण में अहंकार को न आने दें, तो बुराई की समस्या का समाधान हो सकता है। अतः यही ध्यान रखना होगा कि अहंकार और बुद्धि भी कहीं हमारे मन और चित्त के साथी न बन जायँ। मन और चित्त में तो समस्याएँ भरी हुई हैं। चेष्टा यही करनी होगी कि बुद्धि और अहंकार सुरक्षित रहें। रावण का दुर्भाग्य यह है कि उसके चरित्र में बुद्धिजन्य दोष भी आ जाता है, वह जो भी समझता है, उल्टा समझता है, अपने दुर्गुणों को अहंकार की दृष्टि से देखता है और सोचता है कि मैं बिल्कुल ठीक हूँ, मुझ जैसा पण्डित, मुझ जैसा महापुरुष संसार में कोई है ही नहीं।
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