अगर गहराई से विचार करके देखें तो ऐसा प्रतीत होता है कि किसी न किसी संदर्भ में या किसी न किसी दृष्टि से प्रत्येक मान्यता के पीछे एक बड़ा बल है, एक बड़ा तर्क है। लेकिन इतना होते हुए भी जब हम अपने लिए चुनाव करने चलेंगे तो किसी एक के प्रति आग्रह अवश्य होगा। उसी प्रकार जैसे, एक रोगी यदि यह जान भी ले कि सारी चिकित्सा-पध्दतियाँ समान रूप से उपादेय है, फिर भी अन्त में उसे यह निर्णय करना पड़ता है कि हम इस रोग के लिए किस चिकित्सा-पध्दति का आश्रय लें ? और जिस पध्दति का हम चुनाव करते हैं, उसकी जो मान्यताएँ और औषधियाँ हैं, उन्हें भी हम स्वीकार करते हैं, पर इस चुनाव की भी एक कसौटी है। कसौटी यह नहीं है कि कौन-सी पैथी ठीक है ? बल्कि सबसे कसौटी यह है कि व्यक्ति को स्वस्थता किससे मिलती है ? स्वस्थता ही कसौटी है।
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