व्यक्ति के अन्तःकरण में विवेक का उदय हो जाने पर उसके जीवन में आग्रह समाप्त हो जाना चाहिए, लेकिन इस अनाग्रह में एक बड़ी जटिल समस्या है। मान लीजिए ! किसी व्यक्ति का यदि आग्रह हो कि सारी चिकित्सा पध्दतियों में केवल उसी की चिकित्सा पध्दति श्रेष्ठ है, तो यह तो विवेक का लक्षण नहीं माना जाता, किन्तु दूसरी ओर व्यक्ति जब चिकित्सा करने चलेगा, रोग के लिए दवा करने चलेगा तो ऐसी परिस्थिति में उसको किसी न किसी प्रकार का आग्रह स्वीकार करना पड़ेगा। उस प्रकार यहाँ आग्रह और अनाग्रह का बड़ा विचित्र समन्वय है। अभिप्राय यह है कि विवेक में तो अनाग्रही होना चाहिए। इसी अनाग्रह का दर्शन भगवान श्रीरामकृष्ण देव ने विविध साधना पध्दतियों की चरम उपलब्धि के माध्यम से प्रकट किया। उन्होंने बताया कि विविध पध्दतियों के द्वारा उन्हें एक ही सत्य का साक्षात्कार हुआ, लेकिन इतना होता हुए भी व्यक्ति के सामने एक प्रश्न रह जाता है कि जब वह किसी पध्दति का चुनाव करेगा तो यत्किंचित आग्रह किए बिना वह उस पध्दति को स्वीकार नहीं कर सकेगा। यद्यपि आग्रह जहाँ होता तो, वहाँ पर प्रत्येक व्यक्ति यही कहता है कि हमारी जो मान्यता है वही वैज्ञानिक है और दूसरों की अवैज्ञानिक। लेकिन समन्वय का अभिप्राय यह है कि हम पहले यह समझ लें, जान लें तथा मान लें कि सभी पध्दतियाँ सही और वैज्ञानिक हैं।
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