मानस-रोगों के संदर्भ में एक और बड़े महत्व की बात बतायी गयी है कि रोग की चिकित्सा ऐसी नहीं होनी चाहिए जिससे एक रोग तो घटे पर दूसरा बढ़ जाय। परशुरामजी समाज की अस्वस्थता की चिकित्सा करने के लिए आये थे। उस समय जितने भी महापुरुष थे, वे सभी समाज को स्वस्थ करने की चेष्टा कर रहे थे। विश्वामित्र भी एक महापुरुष के रूप में समाज को स्वस्थ करना चाहते थे और परशुराम भी, फिर महाराज श्री जनक भी। दूसरी ओर रावण जैसे लोग थे, जो समाज में अस्वस्थता का, दोषों का, दुर्गुणों का संचार कर रहे थे। तो, प्रश्न यह आता है कि विश्वामित्र, परशुराम और जनक जैसे लोगों के होते हुए भी भगवान राम को क्यों आना पड़ा ? इसके उत्तर में यह कहा जा सकता है कि रोग और राक्षस इतने बढ़े हुए थे कि उनकी कोई सीमा नहीं रह गयी थी, या फिर यह कह सकते हैं कि जो चिकित्सक थे, उनमें कुछ न कुछ अपूर्णता विद्यमान थी, जिसका परिणाम यह होता था कि एक ओर तो व्यक्ति और समाज की रोग दूर होता था, पर दूसरी ओर समाज में एक नया असंतुलन उत्पन्न होता था। परशुरामजी का चरित्र इसका प्रमाण है। वे लोभ के सबसे बड़े चिकित्सक थे। आप देखेंगे कि उनके चरित्र में दो महान गुण थे - एक तो उन्होंने जीवन में कभी राज्यसत्ता का लोभ नहीं किया और दूसरे वे जीवन भर बाल ब्रह्मचारी रहे। इसका अभिप्राय यह है कि वे काम के विजेता थे और लोभ के भी। और उन्होंने चिकित्सा भी ठीक उसी प्रकार से की। लेकिन उनमें क्रोध भरा हुआ था। वे स्वयं कहते हैं मैं बहुत क्रोधी हूँ, तब मानो अपनी अस्वस्थता की सूचना देते हैं। इस प्रकार अपने क्रोध के द्वारा वे समाज में एक दूसरा असन्तुलन उत्पन्न कर देते हैं।
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