जो योगी थे, उन्होंने समस्या का केन्द्र स्वीकार किया चित्त को। ये सब अन्तःकरण चतुष्टय में अलग-अलग केन्द्र के रूप में चुना गया। व्यक्ति बहुत सी बातों के बारे में समझ लेता है कि ये बातें ठीक नहीं है। भाषण में जब कोई बहुत सुन्दर तार्किक पध्दति से कोई बात कहता है तो सुनकर लगता है कि उसकी बात बिल्कुल ठीक है, लेकिन ठीक लगते हुए भी, समझ में आ जाने के बाद भी, वह जाना हुआ सत्य जीवन में क्यों नहीं उतर पाता ? व्यक्ति की बुद्धि और चित्त में द्वन्द्व है। बुद्धि के द्वारा हम कुछ बातों को समझना चाहते हैं, स्वीकार करना चाहते हैं, पर चित्त वह है, जहाँ पर हमारे संस्कार, पूर्व-पूर्व जन्मों में किए हुए कर्मों के संस्काररुप में संग्रहीत हैं। जो पूर्व जन्मों के अभ्यास और संस्कार हैं और यह जो वर्तमान में बुद्धि के द्वारा जाना गया सत्य है, उनमें टकराहट होती है और उस टकराहट में बुद्धि , जो इस जीवन में सत्य को समझ गयी है, चित्त के संस्कारों और अभ्यासों के सामने परास्त हो जाती है। ज्ञान की शैली है, बुद्धि का शोधन। योग की शैली है - "योगश्चित्तवृत्ति निरोध:"। जब तक हम चित्त को संस्कारों से शून्य नहीं कर लेंगे, तब तक हम कितना भी सुन लें, समझ लें, पर उसे जीवन में नहीं उतार पायेंगे।
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