मनु ने भगवान के लिए जो शब्द कहे वह बड़े सार्थक हैं। मनु ने कहा - "सुनु सेवक सुरतरु सुरधेनू।" आप तो कल्पतरु हैं। हमारी जो कल्पना होगी उसे आप साकार कर देंगे, पर मनु ने उन्हें केवल सुरतरु ही नहीं, कामधेनु भी कहा। वैसे तो कल्पतरु और कामधेनु दोनों का गुण एक ही माना जाता है। दोनों ही कामनाओं और कल्पनाओं को पूरा करते हैं। तो यहाँ कल्पतरु के साथ कामधेनु कहने की क्या आवश्यकता है ? आवश्यकता यह है कि यहाँ प्रार्थना करने वाले दो हैं - मनु और शतरूपा। एक पुरुष और एक स्त्री। तो जहाँ मनु ईश्वर की कल्पना पुरुष के रूप में करते हैं, वहाँ तो वे कल्पतरु हैं और जहाँ शतरूपा उन्हें आदिशक्ति के रूप में, नारी के रूप में कल्पना करती हैं, वहाँ वे कामधेनु हैं। ईश्वर पुरुष है या नारी ? तो वे तो केवल जहाँ एक ओर कल्पतरु हैं, पुरुष हैं; वहीं दूसरी ओर कामधेनु हैं , नारी हैं। आप जो चाहें कल्पना कर लीजिए, उसे पूरा करना उनका स्वभाव है।
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