Thursday, 10 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............

शरीर के रोगों के संदर्भ में जैसे विभिन्न प्रकार की चिकित्सा पध्दतियाँ प्रचलित हैं और प्रत्येक पध्दति की अपनी मान्यताएँ और धारणाएँ हैं, राजनीति के क्षेत्र में भी सामाजिक निर्माण के लिए विविध वाद प्रचलित हैं, इसी प्रकार मनुष्य के अंतःकरण के संबंध में भी विभिन्न प्रकार की पध्दतियों का वर्णन महापुरुषों के द्वारा हमारे शास्त्रों में किया गया है और यदि हम इस दृष्टि से विचार करने बैठें कि इनमें से कौन-सी पध्दति श्रेष्ठ है तो यह एक ऐसा जटिल विवाद है कि जिसका कभी निपटारा ही नहीं हो सकता। विभिन्न विचारकों और महापुरुषों ने अपने-अपने वाद प्रस्तुत किए हैं और ऐसी पध्दति से किए हैं कि अवश्य ही वे बड़े तर्कसंगत प्रतीत होते हैं। ऐसी परिस्थिति में किसी को स्वीकार करें और किसी को स्वीकार न करें, ऐसा संभव नहीं। किन्तु फिर भी व्यक्ति के सामने यह समस्या तो आती ही है कि उसे उन समस्त वादों में से किसी न किसी पध्दति का आश्रय लेना ही पड़ता है। यहाँ पर एक बड़ी जटिल समस्या है कि व्यक्ति के जीवन में आग्रह होना चाहिए या नहीं ? तो उसका उत्तर है कि अनाग्रह ही विवेक की चरम उपलब्धि है - "बुध्देः फलमनाग्रहः" ।

No comments:

Post a Comment