Saturday, 12 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............

ईश्वर के संदर्भ में रामचरितमानस में भक्तों ने एक बड़ी मधुर बात कही है। जब वह तर्क-वितर्क चला कि ईश्वर कैसा है तो इसका भी वही समाधान निकला। सभी लोगों ने ईश्वर के अलग-अलग रूपों को बताया। भक्तों ने इसे अकेले दूसरे ढंग से कहा। उन्होंने कहा कि भाई ! इस विषय में बहस करने और उलझने से कोई लाभ नहीं है कि ईश्वर कैसा है ? हमें तो यह निर्णय करना है कि हमें कैसा ईश्वर चाहिए ? हमें जिस ईश्वर की आवश्यकता है, वह तो हमारे संस्कार और रुचि से जुड़ा हुआ है। हम व्यर्थ ही विवाद में पड़कर परस्पर उलझ रहे हैं। हम तो अपनी इच्छानुसार ईश्वर का चुनाव करते हैं। इसलिए जहाँ बहुत से लोग इस विवाद में उलझे रह जाते हैं कि ईश्वर का वास्तविक स्वरूप क्या है ? निराकार है या साकार, निर्गुण है या सगुण, सगुण निराकार है निर्गुण निराकार, एक ही हैं या दोनों या सब ? अब अगर आप इसे भक्त की दृष्टि से देखें तो किस तरह देखेंगे ?

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