Thursday, 17 September 2015

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............

ईश्वर के संदर्भ में कहें या जीवन के किसी क्षेत्र के संदर्भ में, एक ही सत्य को विद्वानों ने विविध रूपों में वर्णन किया है, इस सत्य को जान लेने के बाद अन्ततोगत्वा हमें अपने लिए किसी एक का वरण कर लेना पड़ता है और उसी पध्दति के अनुकूल, जैसा कि गोस्वामीजी ने विनय पत्रिका में कहा है ; उनसे पूछा गया कि महाराज ! कौन-सा पुराण ठीक है ? कौन-सा शास्त्र ठीक है ? कौन से मुनि ठीक हैं ? गोस्वामीजी ने बड़ी मधुर बात कही - यदि सबकी बातों को पढ़ें तो ऐसा लगता है कि इनमें तो परस्पर झगड़ा है। तो फिर क्या करें ? क्या यह सब छोड़ दें ? सबको अस्वीकार कर दें ? उन्होंने कहा, नहीं - बस, गुरुजी ने कह दिया कि तू राम नाम लिया कर। मुझे तो लगा कि यही मेरे लिए राजमार्ग है। मैं इसी राजमार्ग से चल पड़ा। इसका अभिप्राय यह है कि आप विवेकपूर्ण इस सत्य को जान लें और आग्रह में न पड़ें कि इनमें से सत्य कौन-सा है ? बल्कि इस दृष्टि से विचार करें कि सत्य का कौन-सा रूप हमारे लिए व्यक्तिगत रूप से और सामाजिक रूप से कल्याणकारी है और उसी को हम जीवन में स्वीकार कर लें।

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