.....कल से आगे ....
महाराज श्रीदशरथ की मृत्यु हो चुकी है । सभी रानियाँ विधवा वेश में हैं, प्रजा शोक वेष में है, लेकिन मंथरा उस समय भी अपने आपको सुन्दर वेशभूषा से सजा लेती है तथा आभूषण धारण कर लेती है । और इसी वेष में वह वहाँ पर पहुँचती है । उस समय श्रीभरत तो इतने व्याकुल हैं कि कुछ कहने और सुनने की मनःस्थिति में ही नहीं हैं । लेकिन शत्रुघ्नजी की दृष्टि मंथरा पर पड़ जाती है । उनको ऐसा लगता है कि यह जो कुछ अनर्थ हुआ है, उसके मूल में मंथरा है । अगर मंथरा न होती तो संभवतः ये घटनाएँ भी न होतीं । इसलिए इस घटना की सबसे बड़ी अपराधिनी यही है । और शत्रुघ्नजी का दर्शन यही है कि अपराधी को कठोर-से-कठोर दण्ड देना चाहिए । इसलिए उन्होंने आगे बढ़कर उसके कूबड़ पर प्रहार किया । उन्हें लगा कि मन्थरा में दोष है कूबड़ अर्थात कुटिलता और टेड़ापन ही उसका दोष है । इसलिए उन्होंने पहले उसके कूबड़ पर ही प्रहार किया । पर उन्होंने देखा कि अरे, यह तो सिर से पैर तक बुरी है । पैर के नख से चोटी तक इसमें कहीं कोई अच्छाई का लेशमात्र नहीं है । और तब उसकी चोटी पकड़कर उसे घसीटने लगे ।
.....क्रमशः .....
महाराज श्रीदशरथ की मृत्यु हो चुकी है । सभी रानियाँ विधवा वेश में हैं, प्रजा शोक वेष में है, लेकिन मंथरा उस समय भी अपने आपको सुन्दर वेशभूषा से सजा लेती है तथा आभूषण धारण कर लेती है । और इसी वेष में वह वहाँ पर पहुँचती है । उस समय श्रीभरत तो इतने व्याकुल हैं कि कुछ कहने और सुनने की मनःस्थिति में ही नहीं हैं । लेकिन शत्रुघ्नजी की दृष्टि मंथरा पर पड़ जाती है । उनको ऐसा लगता है कि यह जो कुछ अनर्थ हुआ है, उसके मूल में मंथरा है । अगर मंथरा न होती तो संभवतः ये घटनाएँ भी न होतीं । इसलिए इस घटना की सबसे बड़ी अपराधिनी यही है । और शत्रुघ्नजी का दर्शन यही है कि अपराधी को कठोर-से-कठोर दण्ड देना चाहिए । इसलिए उन्होंने आगे बढ़कर उसके कूबड़ पर प्रहार किया । उन्हें लगा कि मन्थरा में दोष है कूबड़ अर्थात कुटिलता और टेड़ापन ही उसका दोष है । इसलिए उन्होंने पहले उसके कूबड़ पर ही प्रहार किया । पर उन्होंने देखा कि अरे, यह तो सिर से पैर तक बुरी है । पैर के नख से चोटी तक इसमें कहीं कोई अच्छाई का लेशमात्र नहीं है । और तब उसकी चोटी पकड़कर उसे घसीटने लगे ।
.....क्रमशः .....
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