Sunday, 26 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

.....कल से आगे .....
यद्यपि श्रीभरतजी यहाँ पर बड़े दुखी हैं और बड़े कठोर शब्दों में कैकेयी की भर्त्सना करते हैं, पर इतना होते हुए भी जब शत्रुघ्न ने मंथरा को कठोर दंड दिया तो भरतजी ने शत्रुघ्न को शाबाशी नहीं दी, यह नहीं कहा कि तुमने बहुत अच्छा किया, यह दंड देने योग्य ही है । यदि वे ऐसा कहते तो कोई अस्वाभाविक बात न होती, बल्कि यह प्रसंग के अनुकूल ही प्रतीत होता । लेकिन गोस्वामीजी कहते हैं कि श्रीभरत ने तुरन्त शत्रुघ्नजी का हाथ पकड़ लिया और कहा - नहीं, नहीं, मंथरा को दंड देने की आवश्यकता नहीं है, तब दयानिधि श्रीभरत ने उनको छुड़ा दिया । इस संदर्भ में यह जो एक दृष्टिकोण श्रीभरत का है और एक श्री शत्रुघ्न का, अगर इन दोनों दृष्टिकोणों पर विचार करें तो उसका तात्पर्य यह है कि दुर्गुणों के द्वारा समाज में जो समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, उसका समाधान करने के लिए बहुधा दो प्रकार के विचार सामने आते हैं । इनमें से एक मान्यता जो समाज में बहुत प्रचलित है वह यह है कि अगर समाज में अपराध को रोकना है तो अपराधी को इतना कठोर दंड दिया जाना चाहिए कि व्यक्ति अपराध करने का साहस ही न करे । इससे अपराध रुकता है । पर कभी-कभी ऐसा अनुभव होता है और प्रत्यक्ष भी दिखाई देता है कि कठोर दंड व्यवस्था के द्वारा बुराइयाँ तात्कालिक रूप से दूर होती हुई तो प्रतीत होती हैंं पर समाधान टिकाऊ नहीं रहता । और यह दूसरी मान्यता है ।

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