हनुमानजी जैसे वैद्य भी चेष्टा करके रावण की चिकित्सा नहीं कर पाते । क्यों ? मानस-रोग के संदर्भ में पहला सूत्र यह है कि जो सद्गुरु हैं, वे ही वैद्य हैं और रोगी का पहला कर्तव्य है कि वह उसके वचनों पर विश्वास करे । हनुमानजी ने यहाँ पर रावण के रोगों को पकड़ लिया और उन्होंने यह निर्णय किया कि रावण के रोगों का यह जड़ यदि एक बार नष्ट हो जाए, तो उसके अन्य रोग स्वयं नष्ट हो जाएँगे । इसलिए हनुमानजी ने तुरन्त रावण से अनुरोध किया कि मैं तुम्हें कुछ और छोड़ने के लिए नहीं कहता, तुम केवल एक ही वस्तु छोड़ दो । क्या ? - तुम तमरूप अभिमान का त्याग कर दो । हनुमानजी इतने उदार हैं कि उसे केवल एक ही वस्तु छोड़ने के लिए कहते हैं । यदि बहुत कुपथ्य करने वाला रोगी हो और उसको वैद्य अगर सब कुछ छोड़ने के लिए कहे तो शायद वह एक भी बात न माने । तो चतुर वैद्य कहता है कि अच्छा भइ, भले सब न छोड़ सको, पर इतना तो छोड़ ही दो । हनुमानजी ने कहा कि सारे विकारों को भले न छोड़ सको, पर अभिमान छोड़ दो । और अभिमान में भी एक शब्द जोड़ दिया - तम अभिमान । चलो सतोगुणी, रजोगुणी अभिमान को न छोड़ पाओ तो कोई बात नही है, पर कम-से-कम तमोगुणी अभिमान को छोड़ दो । पर रावण का रोग इतना बढ़ गया है कि हनुमानजी की हितकर बातें भी उसे नहीं सुहाती ।
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