Saturday, 11 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

प्रतापभानु अगले जन्म में रावण बन जाता है । रावण के रूप में उसके जीवन का एक ही व्रत था कि ब्राह्मणों और मुनियों को खाना । यह किस बात की प्रतिक्रिया थी ? यही कि मैं इन ब्राह्मणों को भोजन करा रहा था और इन लोगों ने मुझे शाप दे दिया, बिना अपराध के । तो मैं इन सबको खाऊँगा । अब ये मेरा क्या कर सकते हैं । यही क्रोध की हिंसक प्रतिक्रिया रावण के चरित्र में विद्यमान है । भगवान राम को दण्डकारण्य में रावण के क्रोध की प्रतिक्रिया दिखाई देती है । दण्डकारण्य में वे देखते हैं कि वहाँ मुनियों की हड्डियों का ढेर लगा हुआ है । भगवान पूछते हैं कि यह हड्डियों का ढेर कैसा है ? इस पर मुनि लोग आँखों में आँसू भरकर कहते हैं - निशाचरों ने मुनियों को खा लिया है । पर विचित्र विडंबना तो यह है कि इन निशाचरों का निर्माण भी तो मुनियों ने ही किया था । अपना ही निर्माण अपने को खा जाए - यह एक बड़ी विचित्र स्थिति है । और ऐसा ही होता है कि अपने से उत्पन्न हुआ दुर्गुण अपने ही लिये तथा समाज के लिए घातक हो सकता है ।

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