Friday, 24 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

रामचरितमानस में एक प्रसंग में जहाँ गुरु वसिष्ठ के आदेश से श्रीभरत ननिहाल से आते हैं, तो कैकेयी बड़े उत्साह से उनका स्वागत करती है । लेकिन श्रीभरत दुख और पीड़ा से परिपूर्ण अयोध्या के सारे वातावरण को देखकर अत्यंत व्यथित हैं इसलिए उनको इस स्वागत में सुखानुभूति नहीं होती । और वे माँ से अयोध्या में व्याप्त म्लानता का कारण पूछते हैं । कैकेयी बड़े आनन्द से अपनी सारी करतूतों का वर्णन करने लगती है । उसी समय वहाँ मन्थरा आ जाती है जो इन सारी घटनाओं का सूत्रधार है । कैकेयी यही समझ रही थी कि भरत को सिंहासन पर बिठाने के लिए मैंने इतना प्रयास किया है तो भरत के मन में मेरे प्रति बड़ी कृतज्ञता होगी कि मैंने कितना कष्ट सहकर उसे अयोध्या के साम्राज्य का उत्तराधिकारी बनाया है । और मन्थरा के ह्रदय में तो और भी गहरा विश्वास था कि यह सारा कार्य तो मेरे द्वारा ही सम्पन्न हुआ है, इसलिए उस अवसर पर, जब श्रीभरत और कैकेयी एकान्त में मिल रहे हैं, अपनी उपस्थिति के द्वारा इस महान कार्य में जो मैंने भूमिका निभाई है, उसे प्रदर्शित कर दूँ । इस समय सामने जाने से हो सकता है कि श्रीभरत सिंहासन पर बैठने से पहले ही मुझे पुरस्कार दे दें । नहीं तो कौन जाने सिंहासन पर बैठने के बाद कहीं वे मुझे भूल न जाएँ । पर यहाँ तो श्रीभरत अत्यंत दुखित हो मूर्च्छा की स्थिति से उठ रहे हैं । उस समय मन्थरा का वहाँ पहुँचना और उसका आचरण परिवेश के सर्वथा प्रतिकूल है ।
    ....आगे कल .....

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