भगवान शंकर इतनी सीमित मात्रा में क्रोध का प्रयोग करते हैं कि वासनात्मक अनियंत्रित काम तो नष्ट हो जाय पर समाज में रस की वृत्ति का विनाश न होने पाये । वे इतने नियंत्रित हैं कि काम की पत्नी के आने पर उस पर क्रोध नहीं करते । काम के साथ उसकी पत्नी रति भी आई थी पर शंकरजी ने काम को जलाया रति को नहीं । क्यों ? जितने भक्त हैं वे भगवान से यही तो माँगते हैं कि उन्हें काम नहीं चाहिए पर रति तो चाहिए ही । रामायण में भरतजी से बढ़कर भक्त नहीं है । उनको काम की आकांक्षा है ही नहीं - उन्हें न तो अर्थ चाहिए, न धर्म चाहिए, न काम चाहिए और न मोक्ष चाहिए । वे कहते हैं - एक चीज चाहिए । क्या ? - 'जनम जनम रति राम पद' - रति चाहिए । रति में जो तद् रूपता है, वह किस भक्त को नहीं चाहिए? भक्त तो यही चाहता है कि हम भगवान का ध्यान करते-करते भगवान के तद् रूप हो जाएँ, एकाकार हो जाएँ । तो भगवान शंकर रति को भी जीवित रखते हैं और रस की आकांक्षा को भी ।
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