Tuesday, 28 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

लक्ष्मणजी अपराध को अपराध मानकर कठोर दण्ड के पक्षधर हैं । और उनके चरित्र में ऐसा दिखाई भी देता है । वे बड़े तेजस्वी हैं, और जहाँ कहीं अन्याय या भूल होती है वहाँ सामान्य व्यक्ति की तो बात ही क्या, बड़े-से-बड़े व्यक्ति को भी वे क्षमा नहीं करते । वे उसकी भर्त्सना और किसी-न-किसी प्रकार से उसे दण्डित करते हैं । लक्ष्मणजी का यह दण्ड विधान एक तात्कालिक उपाय है और भरतजी का उपाय सर्वकालिक है । वे क्या उपाय करते हैं ? मन्थरा को छूड़ा देते हैं । क्यों ? श्रीभरत अपराध को अपराध की दृष्टि से नहीं रोग की दृष्टि से देख रहे हैं । रोगी के प्रति एक वैद्य की जो दृष्टि होती है वही दृष्टि श्रीभरत की मन्थरा के प्रति है । वैद्य जब किसी रुग्ण व्यक्ति को देखता है, तब वह उसे औषधि और उपचार के द्वारा स्वस्थ बनाने का ही विचार करता है, उसे दण्ड देने की बात उसके मन में नहीं आती । श्रीभरत की दृष्टि वैद्य की दृष्टि है और मन्थरा उनकी दृष्टि में एक रोगी की भाँति दया की पात्र है ।

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