गोस्वामीजी अलग-अलग रोगों का विश्लेषण करते हुए कहते हैं कि कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनका जीवन किसी एक दिशा में असंतुलित दिखाई देता है, पर बहुधा वे दूसरी दिशा में वे असंतुलित प्रतीत नहीं होते । देखा जाता है कि कभी-कभी किसी व्यक्ति में तीव्र काम की वृत्ति होती है पर वह उतना लोभी अथवा क्रोधी नहीं होता । कभी-कभी ऐसा भी दिखाई देता है कि एक व्यक्ति बड़ा लोभी है पर उसके स्वभाव में क्रोध और काम की उग्रता नहीं दिख पड़ती । इसी तरह कोई व्यक्ति अत्यंत क्रोधी हो सकता है पर उसमें काम और लोभ की वृत्ति उतनी प्रबल नहीं होती । तो समाज में बहुत से ऐसे व्यक्ति होते हैं, जो इनमें से केवल एक असंतुलन से ही पीड़ित होते हैं । काकभुशुण्डिजी कहते हैं कि यदि तीनों में से किसी एक का असंतुलन हो तो उसकी चिकित्सा करना सरल है । ऐसे व्यक्ति को स्वस्थ बनाना आसान है लेकिन यदि किसी के जीवन में तीनों प्रकार के असंतुलन आ जाएँ, काम, क्रोध और लोभ तीनों प्रबल हो जाएँ तो ऐसे व्यक्ति की चिकित्सा करना बहुत कठिन है ।
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