Tuesday, 21 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

ब्रह्म में न तो राग है न रोष । जब वेदांत के ब्रह्म में राग और रोष नहीं है, तो वह सक्रिय भी नहीं है । वह तो दृष्टा और कूटस्थ है । पुष्पवाटिका प्रसंग में श्रीसीताजी भगवान राम के मन में राग उत्पन्न करती हैं । अब रोष की सृष्टि आवश्यक थी । पुष्पवाटिका में तो उन्होंने राग को स्वीकार कर लिया पर धनुष यज्ञ के प्रसंग में आए तो अपनी भूमिका उन्होंने बदल दी । जनकजी को ऐसा लगा कि जब निर्गुण ब्रह्म को सगुण बनाया गया तो यह सगुण ब्रह्म यदि दृष्टा, कूटस्थ और अचल बना रहेगा और उसमें सक्रियता नहीं आएगी, तब तो यहाँ विवाह का प्रसंग ही पूरा नहीं हो सकेगा । विवाह का प्रश्न तो तभी आयेगा, जब इनके मन में राग हो । और धनुष तो तब टूटेगा, जब इनको क्रोध आवे । अतः राग की सृष्टि के बाद जनक को यह अनुभव हुआ कि इस ब्रह्म में अब रोष की सृष्टि आवश्यकता है । इसलिए उन्होंने रोष भरे वाक्य कहे ।

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