काकभुशुण्डि सुमेरू पर्वत के चार शिखरों पर विभिन्न प्रकार की साधना करते हैं । उनमें से एक शिखर पर आम का वृक्ष लगा हुआ है । और वे उस आम के वृक्ष का उपयोग क्या करते हैं ? यहाँ पर बड़ा मार्मिक संकेत है । आम के वृक्ष का उपयोग काम भी करता है और काकभुशुण्डिजी भी । इसका अभिप्राय यह है कि रस की जो प्यास है, उसी से प्रेरित होकर व्यक्ति कामी बनता है और उसी से भक्त । काकभुशुण्डिजी आम के वृक्ष के नीचे बैठकर क्या करते हैं - आम की छाया में वे मानस पूजा करते हैं । यह मानस पूजा बड़ा सार्थक शब्द है । आम से रस की इच्छा मन में उत्पन्न होती है । और मन से मनोज जुड़ा हुआ है । मनुष्य के अन्तःकरण में रस की आकांक्षा है । और यही आकांक्षा मन को ब्रह्मरस की खोज में ले जाती है तथा अनन्त तृप्ति का अनुभव प्राप्त करती है ।
No comments:
Post a Comment