हनुमानजी वस्तुतः रावण पर साम, दाम, दण्ड और भेद - इन चारों का प्रयोग करते हैं । जब उन्होंने साम का प्रयोग किया तो रावण को भाषण देकर समझाया । फिर उसे दाम नीति का लोभ भी दिखाया - तुम भगवान के चरणकमल को ह्रदय में धारण कर लंका का अचल राज्य करो । हनुमान चालीसा में आप लोग पढ़ते हैं - तुम्हरो मंत्र विभीषण माना । लंकेश्वर भये सब जग जाना ।। वह मंत्र कौन-सा है, यह हनुमान चालीसा में नहीं लिखा है । पर रामायण में इसका उत्तर मिल सकता है । यह मंत्र तो हनुमानजी ने पहले विभीषण को नहीं, रावण को दिया था, पर रावण ने उस मंत्र का तिरस्कार कर दिया और विभीषण ने उसे ग्रहण कर लिया । हनुमानजी का मंत्र क्या था ? यह कि भगवान के चरणों को तुम ह्रदय में धारण करो और लंका का अचल राज्य करो । विभीषण ने इस मंत्र को पूरी तरह से समझ लिया था कि यह बिल्कुल ठीक है । वे जब भगवान की ओर चले तो हनुमानजी के मंत्र का स्मरण करते हुए चले । और भगवान राम उन्हें लंकेश कहकर लंका का अचल राज्य दे देते हैं । हनुमानजी ने रावण को दाम नीति के द्वारा भी आकृष्ट करना चाहा । पर वह भी सफल नहीं हुआ । फिर उन्होंने दण्ड नीति का प्रयोग करते हुए रावण को धमकाया भी । उन्होंने रावण से कहा - तुम जैसे राम के द्रोही को हजारों शंकर, विष्णु और ब्रह्मा भी नहीं बचा सकेंगे । दण्ड नीति में असफल हो जाने के बाद अन्त में हनुमानजी ने भेद नीति का बड़ा कड़ा प्रयोग किया ।
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