Thursday, 9 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

.....कल से आगे .....
आकाशवाणी के माध्यम से भगवान से जो सन्देश मिला उसे यदि विद्वानों और पण्डितों ने सर्वांग रूप से मान लिया होता और अन्न को छोड़कर अपने-अपने घर चले जाते तो शायद क्रोध की प्रतिक्रिया का जन्म न होता । लेकिन उन्होंने आकाशवाणी की आधी बात मानी और एक तीव्रतम प्रतिक्रिया उनके मन में उत्पन्न हो गई । क्या ? आकाशवाणी में तो यही कहा गया था - 'उठि उठि गृह जाहू' । अर्थात अपने-अपने घर को चले जाइए । भोजन मत करिए । यह सुनकर उन्होंने भोजन तो छोड़ ही दिया, पर घर जाने के पूर्व वे स्वयं न्यायाधीश के सिंहासन पर बैठ गए । न्यायाधीश की सबसे बड़ी विशेषता यह होनी चाहिए कि वह स्वयं संतुलित हो, समत्व में स्थित हो, तभी वह ठीक-ठीक न्याय कर पावेगा । यदि वह स्वयं क्रोधग्रस्त हो जाय तो ऐसी स्थिति में वह न्याय नहीं कर पावेगा । क्रोधग्रस्त हो जाने पर तो वह जो करेगा, वह बदले की वृत्ति से करेगा । ब्राह्मणों ने विचारक की भूमिका के स्थान पर बदले की वृत्ति को स्वीकार कर लिया और वे कहने लगे - कि अरे ! मूर्ख राजा ! तूने हम लोगों का धर्म नष्ट करने की चेष्टा की । और साथ-ही-साथ ईश्वर को धन्यवाद देते हुए बोले - यह तो ईश्वर ने हमारे धर्म की रक्षा की । आकाशवाणी में यह नहीं कहा था प्रतापभानु का इसमें कोई दोष है । केवल यही कहा था कि अन्न में माँस मिला हुआ है । लेकिन इन लोगों ने जब शाप दिया तो यह कहकर - जाओ, सारे परिवार सहित राक्षस हो जाओ । तो उनका ऐसा कहना क्या उचित था ? उन्हें इतना क्रोध आ गया कि उसके सारे परिवार को राक्षस होने का शाप दे दिया ।

No comments:

Post a Comment