Monday, 27 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

मनुष्य को दण्ड का भय प्रारंभ में तो अपराध करने से रोकता है पर बाद में व्यक्ति धीरे-धीरे उस भय का भी अभ्यस्त बन जाता है । जैसे इसे यों कहें कि व्यक्ति प्रारंभ में जेल जाने से डरता है, लेकिन अगर दो-चार बार जेल हो आता है तो फिर वह उसका अभ्यस्त हो जाता है । आपको ऐसे हजारों अपराधी मिलेंगे, जो जेल से भयभीत नहीं होते । जेल जाना भी उन्हें स्वाभाविक लगता है । तो दण्ड की व्यवस्था को लक्षणों की चिकित्सा कहा गया है । लक्षणों की चिकित्सा का अभिप्राय यह है कि जैसे अगर सिर में तीव्र पीड़ा हो रही हो और हम सिर पर कोई दवा लगा लें, तो थोड़ी देर के लिए तो सिर में ठण्डक आ जाती है या ऐसी कोई दवा खा लेते हैं, जिसके द्वारा कुछ समय के लिए हमें दर्द से छुटकारा मिल जाता है । तो यह भी एक उपाय है और इसकी भी आवश्यकता है । पर कभी-कभी ऐसी भी एक स्थिति आती है कि लोग गोली खाने के अभ्यस्त हो जाते हैं । और आजकल के चिकित्सक भी यह बताते हैं कि कुछ गोलियों की प्रतिक्रिया बड़ी बुरी होती है । तो जो शरीर के संदर्भ में सत्य है वही मन के संदर्भ में भी सत्य है । जब हम कोई तात्कालिक सरल उपाय सोचते हैं तो उससे हमें तत्काल तो बड़ा संतोष मिलता है पर वह दीर्घकालिक दृष्टि से कल्याणकारी सिद्ध नहीं होता । इसी तरह समाज में अपराध को रोकने के लिए दण्ड की व्यवस्था तो रहेगी पर इस तात्कालिक समाधान के बाद उस समस्या की गहराई में पैठकर उसका मूल समाधान ढूँढ़ना पड़ेगा । उसके कारण को मिटाना पड़ेगा । तब कहीं जाकर सच्चे अर्थों में रोग या बुराइयों से छुटकारा मिलेगा ।

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