जो सामान्य रोगी होता है, वह तो वैद्य की बातों पर विश्वास करता है और उसके कहे अनुसार पथ्य आदि करता है । पर जब रोग असाध्य हो जाता है और रोगी की मृत्यु होनेवाली होती है, तो बहुधा उसकी प्रकृति कुपथ्य की दिशा में होने लगती है । वैद्य जो कहता है वह उसका ठीक उल्टा ही करता है । इसलिए लिखा हुआ है -
काल दंड गहि काहू न मारा ।
हरइ धर्म बल बुद्धि विचारा ।।
- काल लाठी लेकर किसी को नहीं मारता । वह धर्म, बल, बुद्धि और विचार को हर लेता है । हनुमानजी समझ लेते हैं कि रावण जैसा व्यक्ति स्वस्थ होने की स्थिति में नहीं है । और बाद में अंगद आकर घोषणा कर देते हैं कि तुम सन्निपात के रोगी हो । काम, क्रोध और लोभ, इनमें से यदि एक भी जीवन में असंतुलित हो जाए, तो व्यक्ति अस्वस्थ होकर मर सकता है, पर रावण में तीनों ही पराकाष्ठा में हैं । और विशेषकर क्रोध में रावण ने सारे संसार का अहित तो किया ही, पर अपना तो सर्वनाश ही कर लिया ।
काल दंड गहि काहू न मारा ।
हरइ धर्म बल बुद्धि विचारा ।।
- काल लाठी लेकर किसी को नहीं मारता । वह धर्म, बल, बुद्धि और विचार को हर लेता है । हनुमानजी समझ लेते हैं कि रावण जैसा व्यक्ति स्वस्थ होने की स्थिति में नहीं है । और बाद में अंगद आकर घोषणा कर देते हैं कि तुम सन्निपात के रोगी हो । काम, क्रोध और लोभ, इनमें से यदि एक भी जीवन में असंतुलित हो जाए, तो व्यक्ति अस्वस्थ होकर मर सकता है, पर रावण में तीनों ही पराकाष्ठा में हैं । और विशेषकर क्रोध में रावण ने सारे संसार का अहित तो किया ही, पर अपना तो सर्वनाश ही कर लिया ।
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