Thursday, 2 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

जब नारद अपना तीव्र पित्तज्वर भगवान के प्रति कठोर शब्दों का प्रयोग करके उतार चुके, तब भगवान ने प्रत्युत्तर में कुछ न कह, शान्त रह नारद को ठण्डा कर दिया । यदि एक व्यक्ति क्रोध करे और सामनेवाला भी क्रोध करे, तब तो दोनों का क्रोध अग्नि को भड़काएगा ही । भगवान ने नारद का दिया श्राप अपने सिर पर चढ़ा लिया तथा ह्रदय में हर्षित हो उन्होंने नारदजी से बहुत विनती की और अपने माया की प्रबलता खींच ली । बस, त्योंही नारद का आवेश दूर हो गया और उन्होंने भगवान के चरणों को पकड़ लिया तथा ग्लानि में भरकर बोले - प्रभु, मैंने न जाने क्या-क्या आपको कह डाला । भगवान ने कहा - नारद, तुम थोड़े ही कह रहे थे, वह तो तुम्हारा क्रोध कह रहा था । वह अब चला गया है । अब तो जो तुम हो वही हो, इसलिए इस प्रकार विनम्र भाषा का प्रयोग कर रहे हो ।

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