ब्राह्मणों ने प्रतापभानु को शाप देकर सोचा कि हमने अपराधी को दण्ड दे दिया, पर अचानक उनको फिर से आकाशवाणी सुनाई पड़ी । आकाशवाणी में ब्राह्मणों की आलोचना करते हुए कहा गया कि आप लोगों ने इसे जो शाप दिया, वह विचार करके नहीं दिया । यदि प्रतापभानु विचारशून्य हो गया था तो कम-से-कम आप लोगों को तो विचार की भूमिका में रहना चाहिए था । एक व्यक्ति विचारशून्य हो जाय और इसके बदले में दूसरा व्यक्ति भी विचारशून्य होकर आक्रमण करने लगे और शाप देकर किसी को राक्षस बना दें तो यह समाज के लिए कितना घातक होगा । ब्राह्मणों को जो क्रोध हुआ, उससे ब्राह्मणों की महिमा नहीं बढ़ी, अपितु उसके दुष्परिणाम को सारे समाज को न जाने कितने वर्षों तक भोगना पड़ा । भगवान ने ब्राह्मणों की प्रशंसा नहीं की क्योंकि जब कोई व्यक्ति किसी को राक्षस बना देगा, बुरा बना देगा, तो बुरा व्यक्ति तो बुरा बनकर और भी बुराई करने की चेष्टा करने लगेगा । और यही होता है प्रतापभानु के जीवन में ।
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