Monday, 20 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

रामायण में क्रोध के अनेक सूक्ष्म रूप दिखाए गए हैं । रामचरितमानस में सबसे सूक्ष्म क्रम भगवान राम में परिलक्षित होता है । धनुषयज्ञ के प्रसंग में गोस्वामीजी चार व्यक्तियों की तुलना करते हैं । वहाँ हम जनकजी, लक्ष्मणजी, परशुरामजी तथा भगवान राम के क्रोध को देख पाते हैं । अपने-अपने स्थान पर ये चारों व्यक्ति महान हैं, लेकिन चारों की शैली में अन्तर है । पहले तो जनकजी को क्रोध आया ? क्यों ? जब धनुष नहीं टूटा सारे राजा निराश होकर बैठ गए तब सबसे पहले जनकजी को क्रोध आया । गोस्वामीजी यहाँ पर थोड़ी चतुराई करते हैं । वे यह नहीं कहते कि जनक क्रोध में भरकर बोले । वे कहते हैं - "बोले बचन रोस जनु साने" जनकजी के शब्द ऐसे थे कि लगता था कि वे क्रोध से सने हुए हैं । इसका अर्थ क्या है ? यह क्रोध का सोद्देश्य प्रयोग था । जैसे कहीं बड़ी ठण्डक हो जाए, तो गर्मी पैदा करने के लिए हम शरीर को रगड़ते हैं । गर्मी पैदा करने का उद्देश्य है शरीर को ठण्डा होने से बचाना, मृत्यु से बचाना । इस समय तो सारे राजा धनुष तोड़ने में असमर्थ हो रहे हैं और भगवान राम और लक्ष्मण ऐसे प्रशान्त भाव से बैठे हुए हैं कि जैसे धनुष के टूटने न टूटने से उनका कोई संबंध ही नहीं है । जो धनुष तोड़ नहीं सकते, वे चेष्टा करके थक गए, और जो उसे तोड़ने में समर्थ हैं, वे तोड़ने के लिए उद्यत नहीं हो रहे हैं । इसलिए चतुर जनक ने थोड़ी गर्मी पैदा कर दी, और उनका गर्मी पैदा करना सार्थक था ।

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