भगवान शंकर में नियन्त्रण की पराकाष्ठा है । उनका क्रोध पूर्णरूपेण नियन्त्रित है । उनके जीवन में कोई भी ऐसी वृत्ति नहीं है, जिस पर नियंत्रण न हो । यही भगवान शंकर की स्वस्थता का प्रतीक है । और दूसरे पक्ष में वही काम की अस्वस्थता का प्रतीक है । रामायण के प्रारंभ में मानो यह स्वीकार किया गया है कि जब हम शिव के समान केवल बुराई को मिटाने के लिए क्रोध को स्वीकार करते हैं, जितनी मात्रा से बुराई मिट जाय पर भलाई पर आँच न आने पावे तो ऐसी परिस्थिति में क्रोध समाज और व्यक्ति को स्वस्थ बनानेवाला होता है । यह पित्त की उस भूमिका को पूरा करनेवाला है, जिसके द्वारा भोजन पचकर शरीर को शक्ति प्रदान करता है तथा व्यक्ति को सुखी बनाता है । अनियंत्रित क्रोध समाज और व्यक्ति को नाश की ओर ले जाता है । इसके अनेक दृष्टांत हैं । सबसे बुरे क्रोध का चित्रण मिलता है रावण के चरित्र में । रावण के जीवन में अनियंत्रित क्रोध की पराकाष्ठा है ।
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