भगवान शंकर ने जब काम को जला दिया, रति अपने पति काम को जीवित कर देने के लिए अनुरोध करती है । वह भगवान शंकर से कहती है कि महाराज, आपने काम को जला दिया, अब मेरा क्या होगा ? और इसका अभिप्राय यह है कि भले ही भरतजी जैसे भक्तों के जीवन में कामशून्य रति हो सकती है, पर सर्वथा कामशून्य हो जाना तो संसार के सभी व्यक्तियों के लिए सम्भव नहीं है । मेरा तो अपना पति मिलन तभी होगा, जब काम विद्यमान रहेगा । तो भगवान शंकर तुरन्त यह कह देते हैं - अब से तुम्हारे पति का नाम अनंग होगा, और वह अशरीरी होकर रहेगा । जब इतने पर भी रति सन्तुष्ट नहीं होती तब भगवान शंकर कहते हैं - जब भगवान द्वापर युग में श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लेंगे, तब तुम्हारा पति उनके पुत्र के रूप में जन्म लेगा । इसका अभिप्राय यह है कि कामना सहित रति को स्वीकार कर पाना तो केवल ईश्वर के लिए ही सम्भव है । इसकी परिपूर्णता भगवान श्रीकृष्ण के जीवन में मिलती है । श्रीकृष्ण के द्वारा गोपियों को स्वीकार कर लेना तथा साथ ही कुब्जा को भी स्वीकार कर लेना मानो समग्र काम सहित रति को स्वीकार कर लेने का प्रतीक है ।
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