Friday, 3 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

कामजन्य क्रोध का स्वरूप नारद के चरित्र में दिखाई देता है । लोभजन्य क्रोध का स्वरूप कैकेयी के चरित्र में है । कैकेयी में जब लोभ आता है, तब वे कोपभवन में बैठ जाती हैं । परशुरामजी के जीवन में आनेवाला क्रोध अहंकार की प्रतिक्रिया के रूप में उपजता है । उन्हें लगता है कि सामनेवाले व्यक्ति ने उचित आदर नहीं दिया । उन्हें अपने अहं पर इतनी आस्था हैं कि स्वयं अपना परिचय देते हुए कहते हैं कि मैं बालब्रह्मचारी और अत्यंत क्रोधी हूँ । तो, जो क्रोध काम, लोभ और अहं की प्रतिक्रिया-स्वरूप उपजता हैंं, वह पहले देखने में उस अग्नि के समान है, जिसे हम घर में रोज देखते हैं और इस नित्य देखने के फलस्वरूप उसे इतनी भयानक नहीं मानते हैं । पर यदि हम जरा-सी भी असावधानी करें तो वह जैसे कपड़े को पकड़कर व्यक्ति को, घर को जला देती है, उसी प्रकार यह क्रोध भी व्यक्ति के असावधान रहने पर उसे और समाज को सन्त्रस्त कर देता है ।

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