Wednesday, 22 June 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

जनकजी के रोष भरे वाक्यों का परिणाम क्या हुआ?  ब्रह्म (भगवान राम ) में तो कोई गर्मी नहीं आई, पर लक्ष्मणजी में आ गई । वे तमतमा उठे, उनकी भौंहे टेढ़ी हो गयीं, ओठ फड़कने लगे तथा नेत्र क्रोध से लाल हो गए । उनमें क्रोध तो दिखाई दे रहा है, पर उनका क्रोध हर क्षण नियन्त्रित दिखाई दे रहा है । जब वे बोलने चले तो भगवान के चरणों में प्रणाम किया और तब जनक को बहुत कस करके फटकारा । उसका लाभ यह हुआ कि लक्ष्मणजी की गर्मी के बाद भगवान राम में भी कुछ उष्मा आ गई । लक्ष्मणजी भगवान राम के सामने कह रहे थे - हे भानुकुल कमल सूर्य ! मैं बिना किसी अभिमान के कहता हूँ, सुनिए ! यदि मैं आपकी आज्ञा पाऊँ, तो ब्रह्मांड को गेंद की तरह उठा लूँ और उसे कच्चे घड़े की भाँति फोड़ डालूँ । नाथ ! आज्ञा हो तो धनुष को कमल की डंडी की तरह चढ़ाकर, उसे लेकर सौ योजन तक दौड़ता चला जाऊँ । ज्योंही लक्ष्मणजी ने क्रोध भरे बचन बोले कि पृथ्वी डगमगा उठी और सभी लोग और राजा डर गए । लगता है, लक्ष्मणजी में असीम क्रोध है, पर वे इस क्रोध में भी कितने सन्तुलित हैं । यदि कोई व्यक्ति क्रोध में भरा हुआ काँप रहा हो तो उसको समझाने पर भी उसके समझने में बहुत विलंब लगता है । उस समय बुद्धि काम नहीं करती । लेकिन धन्य हैं लक्ष्मणजी, उनका अपने क्रोध पर अद्भुत नियंत्रण है । भगवान राम को लक्ष्मणजी से एक वाक्य भी नहीं कहना पड़ा कि तुम बैठ जाओ, शान्त हो जाओ । उन्होंने लक्ष्मणजी की ओर इशारा मात्र किया । बस दोनों की आँखें मिली और भगवान राम के नेत्रों को देखते ही लक्ष्मणजी शान्त होकर बैठ गए जो उद्देश्य था वह पूरा हो गया ।

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