भेद नीति का तात्पर्य यह है कि जहाँ दो व्यक्ति मिलकर अधिक शक्तिशाली हो रहे हों, वहाँ उन दोनों में फूट पैदा कर दी जाए । पर लंका में हनुमानजी की चेष्टा दूसरे प्रकार की है । वह स्वार्थी राजनीतिज्ञों जैसी चेष्टा नहीं है । हनुमानजी ने देखा कि विभीषण और रावण का एक साथ रहना मानो अच्छाई और बुराई का एक साथ रहना है और इस तरह साथ रहने में अच्छाई का लाभ बुराई को मिल रहा है । क्योंकि विभीषणजी जितनी पूजा-पाठ करते हैं, वह सब रावण के द्वारा दी गई सभी सुविधाओं के बीच ही तो करते हैं । इसलिए उसका पुण्य भी रावण को मिलता जाता है । इस प्रकार वह पुण्य पाप को शक्ति प्रदान कर रहा है । इसलिए हनुमानजी ने निर्णय लिया कि पुण्य को पाप से अलग कर देना चाहिए । इसलिए हनुमानजी भेद नीति का प्रयोग करते हैं ।
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