Sunday, 31 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

दण्डकारण्य में भक्ति की रक्षा के लिए लक्ष्मण वैराग्य की भूमिका में हैं और भगवान राम ? भगवान राम अखण्ड ज्ञान हैं । और आक्रमण करने वाले ये चौदह हजार राक्षस ? ये दुर्गुण और दुर्विचार हैं जो एक साथ अकेले श्रीराम के ऊपर आक्रमण कर देते हैं और ज्ञान के द्वारा ही इन पर विजय प्राप्त होती है । तो यहाँ पर दो भूमिकाएँ हैं - सुरक्षा और संहार । वैराग्य ढाल की तरह भक्ति को सुरक्षित रखता है और ज्ञान खड्ग की तरह दुर्गुण-दुर्विचारों का संहार करता है ।

Saturday, 30 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

खर-दूषण ने जब क्रोध में पागल होकर भगवान राम पर आक्रमण कर दिया, तब भगवान ने लक्ष्मणजी से कहा कि राक्षसों की भयंकर सेना आ रही है, सीता की रक्षा का भार मैं तुम्हें सौंपता हूँ । लक्ष्मणजी तुरन्त श्रीसीताजी को लेकर कंदरा में चले जाते हैं । और इसका अर्थ क्या है ? भक्ति का अर्थ ही है राग । भगवान राग की सुरक्षा तो तभी कर सकेंगे जब संसार से वैराग्य होगा । रामायण में वैराग्य की तुलना ढाल से की गयी है । यह ढाल तो अब आप संग्रहालय में ही देख पाएँगे । आजकल तो उसका प्रयोग नहीं होता । यह ढाल बिल्कुल सूखे चमड़े से बनाई जाती थी । इतिहास को पढ़ने से ज्ञात होता है कि प्राचीनकाल में गैंडे के चमड़े से ढाल बनाई जाती थी । गैंडे की खाल अत्यंत कठोर और मोटी होती है । उसे सुखाया जाता था । खाल का रक्त जब पूरी तरह से सूख जाता था तब उसकी ढाल बनाई जाती थी । तो इतनी कठोरता और इतनी शुष्कता का उद्देश्य क्या था ? कोमलता की रक्षा करना । शरीर कोमल है और सामनेवाला शत्रु जब आक्रमण कर दे, तलवार चला दे, तो परिणाम क्या होगा कि रक्त बहने लगेगा और मृत्यु हो जाएगी । तो योद्धा एक ओर तो तलवार से शत्रु पर प्रहार करता है और दूसरी ओर ढाल से अपनी रक्षा करता है । इसका अभिप्राय यह है कि दुर्गुणों के आक्रमण से हमारा राग संसार में बह गया, नष्ट हो गया तो हमारी साधनाशक्ति, प्राणशक्ति समाप्त हो जाएगी । इसलिए वैराग्य की जो नीरसता है, वैराग्य की जो शुष्कता है, वह भक्ति की कोमलता और सरसता की, भक्ति के राग की रक्षा के लिए है । इसलिए लक्ष्मणजी बड़े नीरस लगते हैं, जो उनके लिए शोभा की बात है । लक्ष्मणजी अगर सरस दिखाई न दें, रुखे-सूखे व कठोर प्रतीत हों, तो यह तो वैराग्य की भूमिका के अनुकूल ही है ।

Friday, 29 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

दण्डकारण्य में शूर्पणखा के काम-क्रोध-लोभ तीनों से मुक्त होकर भगवान राम, सीताजी और लक्ष्मणजी सुरक्षित हैं । पर इसका तात्पर्य यह नहीं कि इतने मात्र से ही बुराई समाप्त हो गई । बुराइयों का भी बड़ा विस्तार है । शूर्पणखा का बड़ा विस्तृत परिवार है । वह अभी हार नहीं मानती, अपने भाई खर और दूषण के पास जाती है । फिर वही क्रम - अयोध्याकाण्ड में मन्थरा की जो भूमिका है - कैकेयी के मन में जिस तरह मन्थरा ने लोभ और क्रोध को जगा दिया, ठीक उसी तरह शूर्पणखा ने यहाँ खर-दूषण के मन में काम और क्रोध की वृत्तियों को जगा दिया । पहले तो यह कहकर वह उनके क्रोध को जगाती है कि उन दो राजकुमारों ने मुझे कुरूप कर दिया है और काम को यह कहकर जगाती है कि उनके साथ एक अत्यंत सुन्दर स्त्री है, जो तुम्हारे योग्य है । इसका परिणाम यह होता है कि वे इस काम की वृत्ति को प्रेरित होकर राम की ओर बढ़ते हैं, पर आगे चलकर जब उनके काम की पूर्ति में रुकावट आई तब क्रोध आ जाता है ।

Thursday, 28 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

यह शूर्पणखा कौन है ? शूर्पणखा शब्द का अर्थ है - सूप के समान नाखूनवाली । जिसके नाखून सूप के समान हों वह शूर्पणखा है । वैसे तो शरीर में जितने अंग हैं उन्हें सुरक्षित रखना चाहिए, लेकिन उनमें से एक ऐसा भी है, जिसे काटते रहना चाहिए । और वह क्या है ? नाखून । वह जरा-सा भी बढ़ जाए तो कैंची लेकर उसे काट देना चाहिए । शरीर और अंगुली तो सुरक्षित रहेंगे, जब इस नाखून को काटते रहेंगे । और मन के संदर्भ में नाखून क्या है ? यह जो मन की वासना है, यही नाखून है । और इस वासना को विचार की कैंची से जो काटता रहेगा, वह व्यक्ति जीवन में सुरक्षित रहेगा । लेकिन जो अपने नाखून न कटावे, शूर्पणखा बन जाए तो उसका परिणाम क्या होगा ? यह होगा कि उसके नाक-कान दोनों कट जाते हैं । और इसका अभिप्राय यह है कि जो अपने जीवन में वासना को नहीं काटता रहेगा, अन्त में वह अनाद्रित होगा । भगवान का संकेत पाकर लक्ष्मणजी ने शूर्पणखा पर प्रहार किया और उसकी कुरुपता प्रकट हो गई ।

Wednesday, 27 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

शूर्पणखा पहले तो काम की सृष्टि करती है, आकर्षित करने के लिए सुन्दर बनकर आती है । माया अर्थात जो वास्तविक नहीं है । जैसा है वैसा न दिखाई देकर भिन्न दिखाई दे । शूर्पणखा सुंदर रूप बनाकर आती है, वह उसका वास्तविक रूप नहीं है - नकली है । और यह भेद तब खुलता है जब वह श्रीराम और लक्ष्मण के बीच पहुँच जाती है । तो शूर्पणखा अभी अपने माया के विस्तार में लगी है । काम का प्रदर्शन करती है और लोभ का प्रलोभन दिखाती है । भगवान राम से कहती है कि मैं विश्वविजेता रावण की बहन हूँ । मुझसे विवाह करके तुम्हें बहुत लाभ होगा । एक लेखक ने तो लिखा है कि राम अगर बुद्धिमान होते तो अवश्य ही शूर्पणखा से विवाह कर लेते । इससे दो राष्ट्रों का मैत्री संबंध हो जाता । पर भगवान राम को न तो शूर्पणखा का सौंदर्य ही आकृष्ट कर पाता है और न लंका के वैभव का प्रलोभन ही । तब वह अपनी अपनी तीसरी वृत्ति को प्रकट करती है । वही क्रम - 'कामात्क्रोधोभिजायते' । शूर्पणखा के अन्तर्मन में तीव्रतम काम-वासना थी और उस वासना का परिणाम यह हुआ कि उसके मन में तीव्रतम क्रोध का उदय हुआ और वह अपने वास्तविक रूप में प्रकट हो गई । काम और प्रलोभन तो आकर्षक होता है पर क्रोध भयावह होता है । सुन्दर-से-सुन्दर व्यक्ति भी जब क्रोधित होता है तो उसकी आकृति बड़ी भयानक हो जाती है । क्रोध से भरी हुई शूर्पणखा अपने भयंकर रूप में प्रकट हो गई और श्रीसीताजी को ही अपने कामनापूर्ति के मार्ग की मूल बाधा समझकर उनको खाने दौड़ी । और तब भगवान राम तुरन्त लक्ष्मणजी को संकेत करते हुए कहते हैं कि अब तुम्हें भक्ति की रक्षा करनी है । तो वैराग्य की दो भूमिकाएँ हैं, एक तो यह कि वह ज्ञान का सदा सहचर है और इसके साथ-ही-साथ वह भक्ति का संरक्षक भी है ।

Tuesday, 26 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

लक्ष्मणजी ने पूछा था कि वैराग्य क्या है ? तो उसके पश्चात भगवान राम ने कहा कि जो माया के आकर्षण में न फँसे वही वैराग्य है । भगवान जानते थे कि लक्ष्मण मूर्तिमान वैराग्य हैं । इसलिए माया को उन्हीं के पास भेज दिया, शूर्पणखा से कह दिया - मेरा छोटा भाई कुमार है । वहाँ तुम चेष्टा करके देखो । शूर्पणखा लक्ष्मणजी के पास जाकर पुनः वही प्रस्ताव रखती है । कहती है - तुम्हारे बड़े भाई ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है और मुझे पता है कि तुम कुमार हो । तुम मेरे विवाह के प्रस्ताव को स्वीकार करो । लक्ष्मण चाहते तो अस्वीकार कर सकते थे, पर वे तो भगवान राम की बात काटना नहीं चाहते थे । और उन्होंने इसके उत्तर में सबसे पहला कार्य यह किया कि 'प्रभु बिलोकि' भगवान की ओर देखा । वैराग्य सुदृढ़ कब रहेगा ? 'ज्ञान कि होइ बिराग बिनु' - ज्ञान और वैराग्य परस्पर पूरक हैं । न ज्ञान के बिना वैराग्य सुरक्षित है और न वैराग्य के बिना ज्ञान । इसलिए सबसे पहले लक्ष्मणजी की दृष्टि भगवान की ओर गई । वैराग्य की दृष्टि ज्ञान की ओर गई । वैराग्य वही है जो एक क्षण के लिए भी ज्ञान से विचलित नहीं होता । जो सदा ज्ञान में स्थिर है वही सच्चा वैराग्यवान् है ।

Monday, 25 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

शूर्पणखा कौन है ? रावण की बहन । मोह की बहन माया । और यह माया पहले तो सुन्दर रूप बनाकर, काम का आकर्षण लेकर आती है और भगवान राम से विवाह का प्रस्ताव रखती है । कहती है - न तो तुम्हारे समान कोई सुन्दर पुरुष है और न मेरे समान कोई सुन्दर नारी । तो भगवान तो यह सुनने के अभ्यस्त थे कि आपके समान कोई सुन्दर नहीं है, पर यह भाषा तो उन्हें पहली बार सुनने को मिली कि मेरे समान कोई सुन्दरी नहीं है । और तब भगवान राम ने किसकी ओर देखा ? काम के आकर्षण से बचने का उपाय क्या है ? माया के द्वारा अगर काम की सृष्टि की गयी हो तो उस काम से बचने का उपाय भगवान राम ने बता दिया । काम से बचने का उपाय है - सीतहि चितइ । भगवान राम ने शूर्पणखा की ओर देखा ही नहीं । तो देखा किसकी ओर ? - श्रीसीताजी की ओर देखा । इसका तात्पर्य यह है कि काम और वासना के आकर्षण से छुटकारा पाना हो तो भक्ति की ओर दृष्टि कर लें । जब दृष्टि भक्ति की ओर चली जाएगी तब वासना का आकर्षण दिखाई नहीं देगा ।

Sunday, 24 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

दण्डकारण्य में लक्ष्मणजी ने भगवान राम से कुछ प्रश्न किए । लक्ष्मणजी पूछते हैं - ब्रह्म क्या है, जीव क्या है, माया क्या है, ज्ञान क्या है, वैराग्य क्या है, भक्ति क्या है ? जब लक्ष्मणजी ने एक साथ इतने प्रश्न रख दिए तो भगवान राम ने कहा - थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई । - लक्ष्मण ! मैं थोड़े में ही सब कह रहा हूँ । लक्ष्मण को बड़ा आश्चर्य हुआ । प्रश्न मेरा इतना विस्तृत और उत्तर संक्षेप में क्यों ? भगवान राम का तात्पर्य था कि लक्ष्मण ! भाषण दूँगा संक्षेप में और दिखलाऊँगा विस्तार में । अभिप्राय यह है कि आगे चलकर जितनी घटनाएँ होती हैं वे सब मानो लक्ष्मणजी के प्रश्नों के ही उत्तर के लिए हैं । लक्ष्मणजी जिस ज्ञान, वैराग्य, माया और भक्ति का लक्षण जानना चाहते थे उसे भगवान श्रीराघवेन्द्र ने शब्दों के द्वारा तो संक्षेप में कहा पर बाद में प्रत्यक्ष दिखा दिया । शूर्पणखा जब भगवान के पास आई तो उन्होने उसे लक्ष्मण के पास भेज दिया । लक्ष्मणजी ने भगवान से पूछा था कि माया का लक्षण क्या है । तो मानो भगवान राम का यह संकेत था कि लो, माया को प्रत्यक्ष भेज रहा हूँ, सुनकर शायद उतना नहीं समझ पाते जितना प्रत्यक्ष देखकर समझ सकोगे । यह प्रत्यक्ष अविद्या माया है ।

Saturday, 23 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

गोस्वामीजी काम, क्रोध और लोभ के चित्र को अरण्यकाण्ड में तुलनात्मक रूप से प्रस्तुत करते हैं । वहाँ ज्ञान, भक्ति, वैराग्य - तीनों संकट में दिखाई दे रहे हैं । अयोध्याकाण्ड में तो इनको केवल वन भेज दिया गया, पर अरण्यकाण्ड में क्या दिखाई दे रहा है ? भगवान राम रुदन कर रहे हैं । श्रीसीताजी लंका में बंदिनी हैं । और एक ऐसा भी अवसर आता है कि जब लंका में लक्ष्मणजी मूर्छित हैं । इस प्रकार ज्ञान, भक्ति और  वैराग्य की स्थिति अयोध्या की अपेक्षा दण्डकारण्य में और भी अधिक संकटापन्न है । वहाँ पर भी काम, क्रोध और लोभ - ये तीनों वृत्तियाँ आती हैं और एकीकृत हो जाती हैं । ज्ञान, भक्ति, वैराग्य जीवन से दूर चले जाते हैं ।

Friday, 22 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

मन्थरा की भूमिका क्या है ? मन्थरा कैकेयी के अन्तःकरण में भेद-बुद्धि उत्पन्न करके ज्ञान को जीवन से दूर कर देती है । मन्थरा कैकेयी के अन्तःकरण में राम के प्रति संशय उत्पन्न कर देती है । संशयात्मिका वृत्ति भक्ति की विरोधी है । एक तो मन्थरा ने कैकेयीजी के मस्तिष्क में इस घातक वृत्ति को पैठा दिया कि राम तुम्हारे अपने नहीं हैं, भरत तुम्हारे अपने हैं । और भक्ति की दृष्टि से भक्त को जब तक भगवान के प्रत्येक क्रियाकलाप में गुण और शील दिखाई देगा तथा उनके गुणों पर हमें विश्वास रहेगा, तभी तक हमारे जीवन में भक्ति रहेगी । पर मन्थरा ने कैकेयी के अन्तःकरण में संशय उत्पन्न कर दिया कि पहले तो राम तुमसे प्रेम करते थे पर अब बिल्कुल नहीं करते । अब तो वे सिंहासन पर बैठते ही भरत को कारागार में डाल देंगे । तुम्हें सौत की सेवा करनी पड़ेगी । कैकेयी के अन्तःकरण में राम के शील के प्रति संशय उत्पन्न हो गया, भक्ति विरोधी वृत्ति उत्पन्न हो गई । और जब उनमें राज्य का लोभ उत्पन्न कर दिया गया तो मानो वैराग्य-विरोधी वृत्ति की उत्पत्ति हो गई ।

Thursday, 21 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

महाराज दशरथ के जीवन में कमी क्या थी ? जब वे कैकेयी के पास आए तो उन्हें प्रसन्न करने के लिए जो वाक्य उन्होंने कहा वह भक्ति से शून्य बना देने वाला है । वह वाक्य क्या था ? उन्होंने कहा - कैकेयी तुम तो जानती हो कि तुम्हारा मुख चन्द्रमा है और मैं चकोर हूँ । भक्त का लक्षण बताते हुए विनयपत्रिका में तुलसीदासजी भगवान राम से कहते हैं कि मैं चकोर बनना चाहता हूँ । लेकिन चकोर किस चन्द्रमा का बनना चाहते हैं ? वे कहते हैं - हे राम ! चन्द्र तो आप हैं ही मुझे चकोर बना लीजिए । भक्त तो वह है जिसकी दृष्टि निरन्तर श्रीरामचन्द्र के मुख पर लगी हुई है । महाराज श्रीदशरथ भी श्रीरामचन्द्र मुखचन्द्र के चकोर हैं, लेकिन इसके साथ-ही-साथ जब उनके अन्तःकरण में कैकेयी का मुखचन्द्र आता है तो वह भी उन्हें आकर्षित कर लेता है । इसका अभिप्राय यह कि वे चाहे कितने भी बड़े भक्त क्यों न रहे हों, लेकिन उस समय उनका जो व्यवहार है, वह भक्ति से शून्य है । व्यक्ति के जीवन में जब भी ऐसी स्थिति आती है तब भक्तिरूपी सीता उनके जीवन से दूर चली जाती हैं । यह स्वाभाविक ही है । इसी प्रकार लोभ की तीव्र प्रवृत्ति आने पर वैराग्य जीवन से दूर चला जाता है ।

Wednesday, 20 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

श्रीजानकीजी और श्रीलक्ष्मणजी भी श्रीराम के साथ वन जाने के लिए व्यग्र हो जाते हैं । श्रीराम जाएँगे तो सीता और लक्ष्मण भी साथ जाएँगे । ज्ञान ही नहीं रहेगा तो न भक्ति ही रहेगी और न वैराग्य ही । जब रहेंगे तो तीनों साथ ही रहेंगे । उस समय कुछ लोग कहने लगे कि आप लोग मत जाइए । यह सुनकर कैकेयी की मनःस्थिति क्या है ? उनमें क्रोध की तीव्रतम अभिव्यक्ति हुई । क्रोध से भरी हुई कैकेयी तमक उठी, और क्या किया - मुनियों के योग्य वस्त्र, कमण्डलु आदि वस्तुएँ लाकर कैकेयी श्रीराम के सामने लाकर रख देती हैं और उनसे कहती हैं कि राम ! ये लोग तुम्हारे हितैषी नहीं हैं । लोभ की वृत्ति में जो दम्भ की प्रकृति निहित रहती है, वह कैकेयी की भाषा में विद्यमान है । दम्भ का अर्थ है कि मन में कुछ और है और दिखावा कुछ और ही किया जा रहा है । कैकेयी राम का हितैषी होने का दिखावा करती हैं । वे कहती हैं - भोग से त्याग-तपस्या श्रेष्ठ है । मैं तुम्हें तपस्या का अवसर दे रही हूँ, पर ये लोग तुम्हारे मार्ग में बाधा उत्पन्न कर रहे हैं, इसलिए तुम जितनी शीघ्र हो सके, यहाँ से चले जाओ । कैकेयीजी का यह तीव्र आक्रोश तब तक शान्त नहीं होता जब तक श्रीराम वन नहीं चले जाते । इसका अभिप्राय यह है कि एक बार जहाँ इस क्रोध की, द्वैत की, भेद की वृत्ति आती है, उस समय व्यक्ति के अन्तःकरण से ज्ञान दूर चला जाता है । उस समय राम भी प्रिय  नहीं लगते, ईश्वर भी अप्रिय लगता है ।

Tuesday, 19 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

व्यक्ति के जीवन में अगर काम, क्रोध, लोभ होगा तो उसका अन्तःकरण ज्ञान, भक्ति, वैराग्य से शून्य होगा । ज्ञान का मुख्य संबंध अद्वैत से है । रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड मे यह संकेत किया गया है कि क्रोध तो बिना द्वैत के आता नहीं और अगर किसी व्यक्ति के अन्तःकरण में द्वैत बना हुआ है, तो इसका अर्थ यही है कि उसके अन्तःकरण में अज्ञान है । जब तक कैकेयी के अन्तःकरण में श्रीराम और श्रीभरत में भेदवृत्ति नहीं थी, तब तक श्रीराम और श्रीभरत उन्हें प्राप्त थे । लेकिन ज्योंही श्रीराम और श्रीभरत में भेदवृत्ति उत्पन्न हुई तो परिणाम स्वरूप उनके अन्तःकरण में क्रोध उत्पन्न हुआ जिसके फलस्वरूप उनमें यह वृत्ति आ गई कि श्रीराम यहाँ से जितनी जल्दी चले जाएँ, उतना ही अच्छा । कैकेयी ने महाराज दशरथ से जो दो वरदान माँगे उनका क्रम इस प्रकार था - पहला राज्य भरत को दिया जाय और दूसरा श्रीराम चौदह वर्ष के लिए वन में निवास करें । तो वरदान इस क्रम से माँगा गया था कि पहले भरत का राज्याभिषेक हो और बाद में राम का वनवास । भरत को राज्य अर्थात अपने पुत्र को सुख और राम को वनवास यानि जिसे वे पराया मानती हैं उसे दुख मिले । लेकिन उनमें इतना तीव्र आक्रोश है कि वे कह देती हैं कि भरत को राज्य मिलने में कुछ विलम्ब हो जाय तो मुझे सह्य है, पर राम के वनवास में अगर विलम्ब हुआ तो मैं नहीं सह सकती । यह है क्रोध की प्रतिक्रिया । इसका अभिप्राय यह है कि हमें सुख मिलने में चाहे देर लगे पर दूसरों को दुःख मिलने में देर बिल्कुल न हो ।

Monday, 18 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

भगवान श्रीराम, सीताजी और लक्ष्मण का एक रूप एतिहासिक है और दूसरा रूप है आध्यात्मिक । उनका यह आध्यात्मिक रूप क्या है ? जब भगवान राम चित्रकूट मैं निवास करते हैं तो गोस्वामीजी वर्णन करते हुए लिखते हैं कि भगवान श्रीराम, सीताजी और लक्ष्मण चित्रकूट में निवास करते हुए कैसे लग रहे हैं - श्रीराम मानो मूर्तिमान ज्ञान हैं । जनकनन्दिनी श्रीसीता मूर्तिमती भक्ति हैं और लक्ष्मण मूर्तिमान वैराग्य हैं । तो उन तीनों काम, क्रोध और लोभ के आने पर तीनों श्रीराम, श्रीसीता और लक्ष्मण का दूर चले जाना सर्वथा मनोवैज्ञानिक है । जब क्रोध आयेगा तो जीवन से ज्ञान दूर चला जाएगा, अर्थात श्रीराम दूर चले जाएँगे । और जब काम आएगा तो जीवन से भक्ति दूर चली जाएगी अर्थात श्रीसीताजी दूर चली जाएँगी । और जीवन में लोभ आएगा तो वैराग्य दूर चला जाएगा अर्थात घनीभूत वैराग्य लक्ष्मणजी दूर चले जाएँगे ।

Sunday, 17 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

गोस्वामीजी एक तुलनात्मक चित्र प्रस्तुत करते हैं । एक ओर लंका है और दूसरी ओर अयोध्या । लंका को हम पाप की नगरी के रूप में देखते हैं और अयोध्या को पुण्य की नगरी के रूप में । वैसे अगर शाश्वत दृष्टि से देखा जाए तो भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में ही किसी का ह्रदय अयोध्या के समान होता है तो किसी का लंका के समान । जहाँ ह्रदय लंका के समान होता है वहाँ स्वाभाविक रूप से असंतुलन का ही राज्य होता है । वहाँ काम, क्रोध और लोभ की वृत्तियाँ ही राज्य करती हैं । लेकिन अयोध्या जैसे ह्रदय में भी यह असंतुलन उत्पन्न होता है । बुरे व्यक्ति के ह्रदय में तो काम, क्रोध और लोभ निरन्तर सक्रिय रहते ही हैं पर भले कहे जाने वाले व्यक्ति के जीवन में भी इनके उद्भव की सम्भावना है । जब व्यक्ति के मन में इन दुर्गुणों का उद्भव होता है तब उसका क्या परिणाम होता है ? जब मन्थरा के द्वारा कैकेयीजी के अन्तःकरण में क्रोध और लोभ की विकृति उत्पन्न की जाती है और महाराज दशरथ काम की वृत्ति लेकर कैकेयी के भवन में जाते हैं ? तब इन त्रिदोषों के उदय के परिणाम स्वरूप तीन वस्तुएँ जीवन से दूर चली जाती हैं । दोनों ओर तीन-तीन हैं । जब काम, क्रोध और लोभ हमारे जीवन में आते हैं तो भगवान श्रीराम, सीताजी और लक्ष्मण जीवन से दूर चले जाते हैं ।

Saturday, 16 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

जब मन्थरा ने कैकेयी के मन में विद्वेष पैदा कर दिया, तब कैकेयी पूछती हैं - अब क्या करूँ ? मन्थरा याद दिला देती है - बस वे ही दो वरदान, एक लोभ का और एक क्रोध का । लोभ का वरदान यानि - राज्य कौशल्या के बेटे को नहीं, मेरे बेटे को राज्य मिलना चाहिए । और क्रोध का वरदान यानि - केवल इतना ही नहीं कि मेरे बेटे को राज्य मिले, बल्कि इसका पूरा सुख तो तब मिलेगा जब कौशल्या से बदला लूँ, उसके बेटे को राज्य से बाहर निकालकर वन में भेज दूँ । मन्थरा ने भेद-बुद्धि की सृष्टि कर उनके मन में लोभ और क्रोध को उत्पन्न कर दिया । और तब उसका परिणाम यह हुआ कि कैकेयी लोभ और क्रोध से भरकर कोप भवन में जा बैठती हैं । और महाराज दशरथ जब कैकेयी के भवन में पहुँचे तो पता चला कि कैकेयी कोप भवन में बैठी हैं । अब इस समय भी अगर महाराज दशरथ लौट जाते तो बात नहीं बिगड़ती । पर उनमें भी वही दुर्बलता थी - काम की दुर्बलता । वह सामने प्रकट हो गई । वे कैकेयी के सौन्दर्य को देखने की तीव्र लालसा के साथ उसके महल में गए । तो लोभ से भरी हुई कैकेयी कोप भवन में बैठी हुई हैं और जो रही-सही कमी थी वह महाराज श्रीदशरथ ने पूरी कर दी । जब सुना कि कैकेयी कोप भवन में है, तो उनके पैर थरथरा उठे, लेकिन चले जा रहे हैं उधर ही । यह व्यंग्य है । जिधर जाने में डर लगे उधर मत जाइए । डर भी लगे और उधर चलते जाना । डर भी लगे और कुपथ्य भी करे, तो रोग होने का यह महालक्षण है । अतः महाराज दशरथ समझते-बूझते हुए कुपथ्य की ओर बढ़ रहे हैं । बस, वहाँ लोभ और क्रोध तो था ही, दशरथजी काम लेकर आ गए । और इस प्रकार ईश्वर जीवन से दूर चले गए और अयोध्या में सन्निपात का आगमन हुआ । इस सन्निपात को भरतजी जैसे वैद्य ही दूर कर सकते हैं । वे अपने चरित्र के द्वारा बताते हैं कि समाज इस रोग के मूल कारण काम, क्रोध और लोभ पर कैसे विजय प्राप्त करे ।

Friday, 15 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

हम मन्थरा और कैकेयी के संदर्भ में देखें तो यहाँ पर भी काम, क्रोध और लोभ तीनों है । तीनों को एक तरह से जोड़ा गया है । ज्ञान की दृष्टि से भी, भक्ति की दृष्टि से भी और कर्म की दृष्टि से भी - तीनों दृष्टियों से उसने अयोध्या में इतनी प्रतिकूलता की सृष्टि कर दी कि काम, क्रोध और लोभ - तीनों एकत्रित हो गए । अब आप ध्यान से देखें कि मन्थरा क्या करने जा रही है ? कैकेयी के मन में तो राम के प्रति कोई क्रोध नहीं था । मन्थरा ने जब कहा कि राम को राज्य मिलने वाला है, तो कैकेयी प्रसन्न हो उठती है । मन्थरा जानती थी, उसने तय कर लिया था कि जब तक मैं इनकी बुद्धि में भेद नहीं उत्पन्न करूँगी, तब तक इनको राम के प्रति द्वेष नहीं होगा, क्रोध नहीं आयेगा - 'क्रोध कि द्वैत बुद्धि बिनु', और तब तक मेरी योजना सफल नहीं होगी । और अविलम्ब उसने अपनी भूमिका प्रारंभ कर दी । उसने कैकेयी को याद दिलाया - जानती हो राम किसके बेटे हैं । कैकेयी के मन में भेद नहीं है, उसके लिए श्रीराम और भरत समान हैं । पर यहीं भेद बुद्धि की प्रतीक - मन्थरा, दोनों में भेद उत्पन्न करने की चेष्टा करती है । पर कैकेयी कहती है - नहीं नहीं, मन्थरा ! राम तो मुझे अपनी माँ से भी अधिक चाहते हैं । इस पर मन्थरा ने तुरन्त कुटिलतापूर्ण सहमति व्यक्त करते हुए कहा कि बिल्कुल ठीक कहती हो । राम पहले कौशल्या जी से अधिक तुम्हें चाहते थे । वह बड़ी सावधानी से बढ़ रही थी, कैकेयी की बात उसने काटी नहीं, बल्कि कहती हैं कि आप बिल्कुल ठीक कह रही हैं लेकिन आपको पता है ? यह पुराना समाचार है । वह जो बात पहले थी, वे दिन अब बीत गए । समय फिर जाने पर मित्र भी शत्रु हो जाते हैं । सूर्य कमल के कुल का पालन करनेवाला है, पर बिना जल के वही सूर्य उन कमलों को जलाकर भस्म कर देता है । कौशल्या तुम्हारी सौत है । वह तुम्हारे सौभाग्य को नष्ट करने पर तुली हुई है । अपने बेटे को सिंहासन पर बैठाकर तुम्हें संकट में डालना चाहती है । इस प्रकार मन्थरा ने कैकेयी के मन में विद्वेष पैदा कर दिया ।

Thursday, 14 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

ज्ञान से क्रोध क्यों जुड़ा हुआ है ? क्रोध कैसे आता है ? अभी आप भोजन कर रहे हैं और भोजन करते समय अचानक जीभ अपने ही दाँतों से दब जाती है और केवल दब ही नहीं जाती, कभी-कभी तो कट भी जाती है और खून निकलने लगता है । पर इतना होने पर भी क्या आपको दाँतों पर क्रोध आता है ? क्या आप तुरन्त डाक्टर के पास जाकर यह कहते हैं कि इन दाँतों को आप निकाल दीजिए, इसने आज मेरी जिह्वा को काट दिया है । दाँत को दंड क्यों नहीं दिलवाते ? वैसे तो रास्ते में भीड़ में अगर पैर भी छू जाय तो लोग भिड़ जाते हैं कि तुमने मुझे पैर से मार दिया या धक्का दे दिया, देखकर नहीं चलते ? रामायण में इसका मनोविज्ञान बताया गया है । ज्ञान का अर्थ है कि जहाँ पर भेद-बुद्धि मिट गयी है । अद्वैत वृत्ति आ गयी है । और जहाँ पर अद्वैत वृत्ति रहेगी, वहाँ पर क्रोध कैसे आएगा । बिना द्वैत बुद्धि के क्रोध कैसा और बिना अज्ञान के क्या द्वैत बुद्धि हो सकती है ? क्रोध आ गया तो इसका अभिप्राय यह है कि अभी द्वैत बना हुआ है, अज्ञानता बनी हुई है ।

Wednesday, 13 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

काम, क्रोध और लोभ की समस्या प्रत्येक व्यक्ति के जीवन से जुड़ी हुई है और ज्ञानी, भक्त तथा कर्मी के जीवन में तो क्रोध, काम और लोभ की विशेष परीक्षा होती है । क्रोध के संदर्भ में ज्ञानी की बड़ी परीक्षा है । अगर क्रोध आ रहा है तो अभी ज्ञान में कहीं-न कहीं कोई कमी है । और काम के संदर्भ में भक्त की बड़ी परीक्षा है । यदि काम का आकर्षण उसको आकृष्ट कर रहा है तो सच्चे अर्थों में राम का आकर्षण उसके जीवन में नहीं है । और लोभ की वृत्ति अगर बनी हुई है तो उसके जीवन में निष्काम कर्म का सच्चा पालन नहीं हो रहा है । तो काम, क्रोध और लोभ ये तीनों क्रमशः भक्तियोग, ज्ञानयोग और कर्मयोग से जुड़े हुए हैं ।

Tuesday, 12 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

मन्थरा यह तो समझती है कि मैं सिंहासन प्राप्त नहीं कर सकती, पर राम को सिंहासन पर बैठने से रोक तो अवश्य सकती हूँ । और तब परिणाम क्या होता है ? - अब उसने बुद्धि का प्रयोग करना प्रारंभ किया । उसने सोचा कि अब तो बस एक ही रात बची है, अब ऐसा कौन-सा उपाय किया जाय जिससे राम को राज्य न मिलने पाए । और तब मन्थरा योजना बनाती है और उस कुटिल योजना को लेकर कैकेयी के पास जाती है । और क्या करती है ? वही भेदबुद्धि से प्रारंभ करती है । वह कैकेयी से कहती है कि कल राम को राज्य मिलने वाला है । यह सुनकर कैकेयी अत्यंत प्रसन्न हो जाती हैं और यहाँ तक कह उठती हैं कि मन्थरा ! अगर यह समाचार सत्य है तो तुम जो माँगोगी वही दूँगी । यहाँ पर देखने से तो यही लगता है कि कैकेयी स्वस्थ हैं । पर इसके अंतरंग में पैठकर विचार करें तो क्या दिखाई देता है ? यहाँ पर गोस्वामीजी बड़ा ही सूत्र देते हैं ।
...सूत्र की चर्चा कल....

Monday, 11 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ..........

गोस्वामीजी कहते हैं कि रामराज्य होने वाला है । चारों ओर नगर सजाया जा रहा है । मन्थरा अचानक पूछ बैठती है कि नगर क्यों सजाया जा रहा है ? लोगों ने कहा - क्या तुम्हें पता नहीं ? श्रीराम का राज्याभिषेक होने वाला है । यह सुनकर मन्थरा को बड़ा बुरा लगा कि इतनी तैयारियाँ चल रही हैं, बाहर के सब लोगों को मालुम हो चुका और मुझे अभी तक पता नहीं । मुझसे छुपाया गया है । मेरी उपेक्षा की गयी है । तब उसकी सन्देह की वृत्ति जाग उठी - जरूर कोई षड्यंत्र की योजना है । और तब उसमें रोग आ गया । कौन-सा रोग ? मानस-रोगों के संदर्भ में गोस्वामीजी ने कहा है - अगर दूसरों के सुख को देखकर जलन होने लगे तो समझ लेना चाहिए कि मन का राजयक्ष्मा हो गया है । तपेदिक या टी बी हो गयी है । मन्थरा तो पहले ही अस्वस्थ थी, हीनता की वृत्ति से ग्रस्त थीं, अब यह राजयक्ष्मा भी आ गया । जब व्यक्ति मन के राजयक्ष्मा से ग्रस्त हो जाता है, तब वह दूसरों के सुख को देखकर जलने लगता है । तब उसके सामने दो ही उपाय होते हैं - या तो वह स्वयं पुरूषार्थ करके सुख प्राप्त करने की चेष्टा करता है या दूसरों के सुख को छीनने की चेष्टा करता है, दूसरे को सुख से वंचित करने की चेष्टा करता है ।

Sunday, 10 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

मन्थरा में इच्छा और दम्भ की वृत्ति विद्यमान है । वह कैकेयी की बड़ी हितैषी होने का दिखावा करती है । परन्तु वस्तुतः उसके मन में कैकेयी के प्रति भी आक्रोश है । क्योंकि ऐसा लगता है कि सर्वत्र उपेक्षित मन्थरा से कम-से-कम कैकेयी तो बड़ा स्नेह करती है । लेकिन कैकेयी के स्नेह में भी आनन्द लेने की वृत्ति थी । वे स्वयं तो बड़ी सुन्दर थीं और मन्थरा थी कुरूप । जैसे एक धनी व्यक्ति एक निर्धन को देखकर इसलिए प्रसन्न होता है कि उसके गर्व को उससे संतोष मिलता है । क्योंकि अपने से अधिक धनी को देखकर वह अपने को धनी कैसे मानेगा । इसी तरह सुन्दर व्यक्ति कुरूप को देखकर अपनी सुन्दरता पर गर्व करता है कि मैं कितना सुंदर हूँ । और रामायण में कई अवसरों पर ऐसा भी संकेत मिलता है कि कैकेयी जी मन्थरा पर जब तब व्यंग्य भी कसती रहती थीं । इसलिए मन्थरा के मन में किसी के भी प्रति, यहाँ तक कि कैकेयी के प्रति भी सहानुभूति नहीं है । उसके मन में प्रत्येक व्यक्ति से बदला लेने की वृत्ति विद्यमान है । और उसका परिणाम यह हुआ कि उसने सारे घटनाक्रम को बदल दिया । वह स्वयं तो रोगी थी ही, औरों को भी रोगी बना देती है ।

Saturday, 9 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

मन्थरा एक साधारण परिवार में उत्पन्न हुई सामान्य नारीमात्र है । कई लोग यह समझते हैं कि मन्थरा ने जो कुछ किया, वह कैकेयी के हित के लिए किया । पर इस बात में सत्यता बिलकुल नहीं है । उसने जो कुछ किया उसमें कैकेयी का हित केवल एक दिखावा मात्र था । गोस्वामीजी कहते हैं कि लोभ के दो बल हैं - इच्छा और दम्भ । इच्छा होती है यह बात तो समझ में आती है, पर दम्भ भी होता है इसका क्या अर्थ है ? इसका अर्थ है कि लोभी अगर दूसरे के सामने लोभी दिखे तो उसकी इच्छा पूर्ण नहीं होगी । लोभी दम्भ करता है, दिखावा करता है कि उसके जीवन में लोभ नहीं है । और तब उसका परिणाम क्या होता है ? लोग ऐसे व्यक्ति पर विश्वास करके धोखा खाते हैं । जहाँ इच्छा के साथ दम्भ मिल जाता है, वहाँ ठगवृत्ति बहुत बढ़ जाती है ।

Friday, 8 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

मलिक मोहम्मद जायसी के बारे में एक बात बड़ी प्रसिद्ध है । वे एक बड़े प्रसिद्ध सूफी सन्त थें । उन्होंने पद्मावत नाम का बड़ा सुन्दर काव्य लिखा है । वे बड़े ही कुरूप थे । एक बार वे राजा की सभा में गए, तो उन्हें देखकर सभा के लोगों के होठों पर हँसी खेल गई । प्रत्यक्ष रूप से तो वे लोग नहीं हँसे, पर मुँह दबाकर हँसने लगे । जायसी ने देख लिया और वे भी हँसने लगे । वे तो विष पचाना जानते थे । जो लोग उनकी कुरुपता पर हँस रहे थे, उनसे उन्होंने तुरन्त पूछा - आप लोग मुँह दबाकर क्यों हँस रहे हैं ? अब कौन कहे कि आपकी शक्ल देखकर हँस रहे हैं । किसी को साहस नहीं हुआ कुछ कहने का । तब उन्होंने स्वयं ही पलटकर कह दिया - मैं समझ गया कि आप लोग मुझी पर हँस रहे हैं । लेकिन मैं आप लोगों से पूछता हूँ, 'मोहि का हँससि कि कोहरसि' - मुझ पर हँस रहे हैं कि कुम्हार पर । घड़ा अगर टेढ़ा हो जाय तो घड़े का दोष है कि कुम्हार का ? अगर मैं ईश्वर की रचना हूँ तो कुम्हार ने मुझे जैसा बनाया, वैसा मैं बन गया । आप लोगों को हँसना है तो ईश्वर पर हँसे, घड़े पर क्यों हँस रहे हैं ? इस प्रकार उपहास और उपेक्षा को इतना आनन्द से स्वीकार कर लेना तो सन्त चरित्र की विशेषता है ।

Thursday, 7 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

महाराज दशरथ और कैकेयी के विवाह में काम और लोभ के समझौते के बाद क्रोध की क्या स्थिति है ? मन्थरा कैकेयी की दासी है । वह कुरूप है, उपेक्षा की पात्र है और हीनवृत्ति से पीड़ित हैं । ऐसी स्थिति में मन्थरा कैकेयी के साथ अयोध्या में आती है । अयोध्या के लोग उसकी कुरुपता पर हँसते हैं । और उसका परिणाम क्या हुआ ? उसके मन में प्रतिक्रिया उत्पन हुई । वह चिड़चिड़ी हो गई । यह एक स्वाभाविक परिणाम है । इस चिड़चिड़ेपन के कारण लोग उसकी निन्दा करते हैं । लेकिन अगर विचार करके देखें तो कुरूप व्यक्ति को चिड़चिड़ा बनाता कौन है ? तो उसे चिड़चिड़ा बनाने का दोष तो दूसरे व्यक्तियों का ही है । जब हम किसी की कुरुपता पर हँसेंगे या व्यंग्य करेंगे, उसे उपेक्षा की दृष्टि से देखेंगे, हँसी का पात्र समझेंगे, तो क्या उसके मन में प्रतिक्रिया उत्पन नहीं होगी ? वह तो कोई बिरला ही व्यक्ति होगा, जो इस घृणा की वृत्ति में भी आनन्द ले ।

Wednesday, 6 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

अयोध्या में सारी समस्या कैसे उत्पन्न हुई । महाराज दशरथ के चरित्र में कमी के कारण । और वह कमी थी असंतुलित काम की । सौन्दर्य के प्रति आसक्ति तथा राग उनके जीवन में बहुत तीव्र था और उस राग का परित्याग वे अपने जीवन में नहीं कर पाए । इसी कारण उन्होंने दो और विवाह किए । उन विवाहों के पीछे उनके मन में यह तर्क था कि वे उत्तराधिकारी के लिए ही विवाह कर रहे हैं । पर उनके पूरे चरित्र को देखने से स्पष्ट हो जाता है कि उन्होंने कैकेयी के सौन्दर्य से आकृष्ट होकर ही विवाह की इच्छा की थी । उन्होंने सुन लिया था कि कैकेयी अत्यंत रूपवती है । और जब उन्होंने कैकय नरेश के सामने कैकेयी से विवाह करने की अपनी इच्छा व्यक्त की तो कैकय नरेश ने उनके सामने शर्त रखी कि मैं अपनी कन्या का विवाह आपसे तभी करुँगा, जब आप यह वचन दे देंगे कि मेरी कन्या के गर्भ से जन्म लेने वाला पुत्र ही अयोध्या के राजसिंहासन का उत्तराधिकारी होगा । तो इसका अभिप्राय क्या हुआ ? यह कि महाराज दशरथ के काम एवं महाराज कैकय के लोभ में समझौता हो गया और इसके बाद महाराज दशरथ का कैकेयी से विवाह हुआ ।

Tuesday, 5 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

सारी अयोध्या की समस्या पर विचार करें, तो देखेंगे कि अयोध्या का सारा समाज काम, क्रोध, लोभ - तीनों से ग्रस्त हो गया है, सन्निपात ग्रस्त हो गया है । पर श्रीभरत ने केवल काम की चर्चा की । उन्होंने कहा कि इस समय अयोध्या में वात रोग हुआ है । और रामचरितमानस की भाषा में काम ही वात रोग है -
    काम वात कफ लोभ अपारा ।
तो श्रीभरतजी ने यहाँ पर जो केवल काम को महत्व दिया, इसका अभिप्राय यह है कि काम, क्रोध और लोभ इन तीनों पर विचार करके देखें तो सबके मूल में काम है । अगर पूरे घटनाक्रम पर विचार करें तो आपको लगेगा कि पहले काम वात आया, उसके बाद क्रोध कफ, और अन्त में क्रोध रूपी पित्त भी आया । इस प्रकार सारा समाज सन्निपात ग्रस्त हो गया ।

Monday, 4 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

गुरु वसिष्ठ समाज की समस्या को आपात दृष्टि से देखते हैं और उसका तात्कालिक समाधान प्रस्तुत करते हैं । वे मानो लक्षणों की चिकित्सा कर रहे हैं । महाराज दशरथ की मृत्यु हो चुकी है, श्रीराम वन को चले गए हैं । ऐसी स्थिति में शासकविहीन समाज में शासनतन्त्र सुव्यवस्थित नहीं रह पाएगा । गुरु वसिष्ठ की दृष्टि से इसका समाधान यही है कि भरत सिंहासन पर बैठकर समाज को सुव्यवस्थित रूप से चलावें । तो देखने में तो यह समाधान गलत नहीं लगता, लेकिन श्रीभरत कहते हैं कि यह जो जल्दी में लिया गया निर्णय है, क्या सचमुच इसके द्वारा समाज की समस्या का समाधान होगा ? आप लोगों ने तो देख ही लिया है कि पिताजी स्वर्ग में हैं, श्रीसीताजी और श्रीराम वन में हैं और मुझे आप राज्य करने के लिए कह रहे हैं । इसमें आप मेरा कोई कल्याण समझते हैं या अपना कोई बड़ा काम होने की आशा रखते हैं । अब आप ही बताइए कि जिसके सिंहासन पर बैठने पूर्व ही इतनी अशुभ घटनाएँ घट गयी हों, तो आगे क्या होगा ? जिसके सिंहासन में बैठने के पूर्व ही पिता और लोकशासक को प्राण त्यागने के लिए बाध्य होना पड़ा हो, जिसे सिंहासन षड्यंत्र से मिला हो और जिसके कारण श्रीराम को वन जाना पड़ा हो, जिस सिंहासन से ईश्वर दूर चला गया हो, उस सिंहासन पर बैठने वाला शासक क्या समस्याओं का समाधान दे सकता है ? आप लोग इस पर गम्भीरता से विचार करें - मैं सत्य कहता हूँ, आप लोग विश्वास करें, धर्मशील को ही राजा होना चाहिए ।

Sunday, 3 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

.....कल से आगे .....
श्रीभरत गुरु वसिष्ठ के चिकित्सा पद्धति से सहमत नहीं होते । जब कौशल्या अम्बा ने देखा कि श्रीभरत इस प्रस्ताव से रंचमात्र भी उत्साहित नहीं हो रहे हैं, अपितु गुरुजी का प्रस्ताव सुनकर उन्हें दुख हो रहा है तब उन्होंने तुरन्त कहा - भरत ! जब वैद्य कोई पथ्य बतावे, कोई दवा बतावे तो यह आवश्यक नहीं है कि वह हमारे मन के अनुकूल ही हो । पथ्य तो बहुधा मन के अनुकूल नहीं हुआ करता । इस समय सारा समाज रोगी है और स्वस्थ होने के लिए गुरु द्वारा दिया गया पथ्य तुम्हें स्वीकार कर लेना चाहिए । इसी से समाज की समस्या का समाधान होगा । सचमुच क्या वह निदान सही था ? क्या औषधि और पथ्य सही था ? तब श्रीभरत ने उसका विश्लेषण किया । गुरु वसिष्ठ की व्यवस्था को वे कुपथ्य मानते हैं । श्रीभरत के कहने का तात्पर्य यह है कि अगर मैं सिंहासन पर बैठ गया, तब तो लोगों को षड्यंत्र और धूर्तता की ही प्रेरणा मिलेगी । असत्य और कठोरता की ही प्रेरणा मिलेगी । लोग यही सोचेंगे कि मंथरा और कैकेयी ने मिलकर ऐसी योजना बनाई और षड्यंत्र रहा कि भरत सिंहासन पर बैठ गए । अगर मेरे द्वारा समाज में मन्थरा और कैकेयी के उद्देश्य की पूर्ति हो जाय तो समाज स्वस्थ होगा या अस्वस्थ ? आज भी यही दिखाई देता है कि कोई बुरा व्यक्ति सफलता प्राप्त कर लेता है और अच्छे व्यक्ति को लोग असफल होते देखते हैं तो बहुतों के मन में यह बात आती है कि शायद अच्छा होने पर बुरा फल भोगना पड़ता है । तो बुरे व्यक्ति की सफलता तो दूसरे व्यक्ति को भी बुराई की ही प्रेरणा देगी ।

Saturday, 2 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

श्रीभरत की दृष्टि वैद्य की दृष्टि है और मन्थरा उनकी दृष्टि में एक रोगी की भाँति दया की पात्र है । इस पर विचार करके देखिए । मंथरा को निमित्त बनाकर अयोध्या में सन्निपात हो गया । वहाँ का सम्पूर्ण समाज सन्निपात ग्रस्त हो गया । और उसकी चिकित्सा श्रीभरत जैसे संत ने की । यद्यपि कौशल्या अम्बा को लगा कि सबसे योग्य चिकित्सक गुरु वसिष्ठ ही हैं । भई, अपने घर का बेटा अगर डाक्टर या वैद्य हो जाय तो माता-पिता को उस पर विश्वास नहीं होता । रामायण में सबसे बड़े वैद्य तो श्रीभरत ही हैं पर कौशल्या अम्बा तो उन्हें पुत्र की दृष्टि से देख रही थीं । उन्हें विश्वास ही नहीं होता कि मेरा पुत्र इतना बड़ा वैद्य है । उन्होनें सोचा कि सारा समाज रोगी हो चुका है और इस रोग को दूर करने वाले वैद्य के रूप में हमारे कुल को गुरु वसिष्ठ जैसे संत और सद्गुरु मिले हैं, अतः समाज के रोग की चिकित्सा उनके द्वारा ही होना चाहिए । तब गुरु वसिष्ठ ने वैद्य की भूमिका स्वीकार कर ली और उन्होंने श्रीभरत से कहा कि तुम अयोध्या का राज्य स्वीकार कर लो और चौदह वर्ष तक राज्य चलाओ । राम के लौटने के पश्चात तुम उन्हें राज्य सौंप देना । पर श्रीभरत उनकी इन चिकित्सा पद्धति से सहमत नहीं होते ।
    .....आगे कल ....

Friday, 1 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

किसी वस्तु की प्राप्ति और उसकी प्राप्ति के सुख की अनुभूति दो अलग बातें हैं । गोस्वामीजी बड़ा ही सार्थक दृष्टांत देते हैं । जैसे विविध प्रकार के व्यंजन लाकर कोई रख दे ! तो व्यंजन तो मिल गया पर व्यंजन का सुख कब मिलेगा ? व्यंजन का सुख तब मिलेगा जब भूख भी लगी हो । यदि भूख न हो और मन्दाग्नि की शिकायत हो तो व्यंजन में रस नहीं मिलेगा । इसलिए व्यंजन के स्वाद की सुखानुभूति के लिए केवल व्यंजन मिल जाना ही पर्याप्त नहीं है । इसी तरह वे कहते हैं कि श्रीराम के दर्शन से सब परम पद के योग्य तो हो गये पर कमी और किस बात की रह गई ? वही भूख की कमी और मन्दाग्नि के कारण यदि व्यंजन से अरुचि हो रही है तो व्यंजन परोसने के साथ-ही-साथ रोग भी दूर करना होगा । और श्रीभरत ने यही किया । भगवान श्रीराम के दर्शन से उन्हें मुक्ति का व्यंजन तो मिल गया, पर रोग दूर हुआ श्रीभरत की कृपा से । भरत जैसे वैद्य के द्वारा जब लोगों के मन रोग दूर हुआ, तब उन्हें मुक्ति सुख की प्रत्यक्ष अनुभूति हुई । यहीं भगवान श्रीराम और श्रीभरत के चरित्र में सामंजस्य है । तो श्रीभरत की भूमिका है वैद्य की और उन्होंने समस्त घटनाओं को देखा रोग के रूप में ।