Sunday, 10 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

मन्थरा में इच्छा और दम्भ की वृत्ति विद्यमान है । वह कैकेयी की बड़ी हितैषी होने का दिखावा करती है । परन्तु वस्तुतः उसके मन में कैकेयी के प्रति भी आक्रोश है । क्योंकि ऐसा लगता है कि सर्वत्र उपेक्षित मन्थरा से कम-से-कम कैकेयी तो बड़ा स्नेह करती है । लेकिन कैकेयी के स्नेह में भी आनन्द लेने की वृत्ति थी । वे स्वयं तो बड़ी सुन्दर थीं और मन्थरा थी कुरूप । जैसे एक धनी व्यक्ति एक निर्धन को देखकर इसलिए प्रसन्न होता है कि उसके गर्व को उससे संतोष मिलता है । क्योंकि अपने से अधिक धनी को देखकर वह अपने को धनी कैसे मानेगा । इसी तरह सुन्दर व्यक्ति कुरूप को देखकर अपनी सुन्दरता पर गर्व करता है कि मैं कितना सुंदर हूँ । और रामायण में कई अवसरों पर ऐसा भी संकेत मिलता है कि कैकेयी जी मन्थरा पर जब तब व्यंग्य भी कसती रहती थीं । इसलिए मन्थरा के मन में किसी के भी प्रति, यहाँ तक कि कैकेयी के प्रति भी सहानुभूति नहीं है । उसके मन में प्रत्येक व्यक्ति से बदला लेने की वृत्ति विद्यमान है । और उसका परिणाम यह हुआ कि उसने सारे घटनाक्रम को बदल दिया । वह स्वयं तो रोगी थी ही, औरों को भी रोगी बना देती है ।

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