Tuesday, 26 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

लक्ष्मणजी ने पूछा था कि वैराग्य क्या है ? तो उसके पश्चात भगवान राम ने कहा कि जो माया के आकर्षण में न फँसे वही वैराग्य है । भगवान जानते थे कि लक्ष्मण मूर्तिमान वैराग्य हैं । इसलिए माया को उन्हीं के पास भेज दिया, शूर्पणखा से कह दिया - मेरा छोटा भाई कुमार है । वहाँ तुम चेष्टा करके देखो । शूर्पणखा लक्ष्मणजी के पास जाकर पुनः वही प्रस्ताव रखती है । कहती है - तुम्हारे बड़े भाई ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है और मुझे पता है कि तुम कुमार हो । तुम मेरे विवाह के प्रस्ताव को स्वीकार करो । लक्ष्मण चाहते तो अस्वीकार कर सकते थे, पर वे तो भगवान राम की बात काटना नहीं चाहते थे । और उन्होंने इसके उत्तर में सबसे पहला कार्य यह किया कि 'प्रभु बिलोकि' भगवान की ओर देखा । वैराग्य सुदृढ़ कब रहेगा ? 'ज्ञान कि होइ बिराग बिनु' - ज्ञान और वैराग्य परस्पर पूरक हैं । न ज्ञान के बिना वैराग्य सुरक्षित है और न वैराग्य के बिना ज्ञान । इसलिए सबसे पहले लक्ष्मणजी की दृष्टि भगवान की ओर गई । वैराग्य की दृष्टि ज्ञान की ओर गई । वैराग्य वही है जो एक क्षण के लिए भी ज्ञान से विचलित नहीं होता । जो सदा ज्ञान में स्थिर है वही सच्चा वैराग्यवान् है ।

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